HomeMaharashtra'शिवसेना किसकी, धनुष-बाण किसका?' सुप्रीम कोर्ट में ठाकरे-शिंदे की जंग तेज, चुनाव...

‘शिवसेना किसकी, धनुष-बाण किसका?’ सुप्रीम कोर्ट में ठाकरे-शिंदे की जंग तेज, चुनाव आयोग पर कपिल सिब्बल का बड़ा हमला

नई दिल्ली। महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे चर्चित मामलों में से एक, ‘असली शिवसेना कौन और धनुष-बाण चुनाव चिह्न पर किसका अधिकार’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। इस मामले में चुनाव आयोग द्वारा एकनाथ शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना के रूप में मान्यता देने और धनुष-बाण चुनाव चिह्न आवंटित करने के फैसले को उद्धव ठाकरे गुट ने चुनौती दी है। इसके साथ ही महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर द्वारा शिंदे गुट के विधायकों को अयोग्य घोषित नहीं किए जाने के फैसले को भी अदालत में चुनौती दी गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ इस ऐतिहासिक मामले की सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान उद्धव ठाकरे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने जोरदार पैरवी करते हुए चुनाव आयोग की निष्पक्षता और उसके निर्णय पर गंभीर सवाल खड़े किए।
सिब्बल ने अदालत में कहा कि किसी भी राजनीतिक दल की पहचान केवल विधायकों की संख्या के आधार पर तय नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, किसी दल की वास्तविक पहचान उसकी संगठनात्मक संरचना, संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था से होती है। उन्होंने कहा कि यदि केवल विधायकों के बहुमत के आधार पर किसी दल का नियंत्रण तय किया जाएगा, तो राजनीतिक दलों की संगठनात्मक व्यवस्था का कोई महत्व नहीं रह जाएगा। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29-ए का हवाला देते हुए सिब्बल ने कहा कि पार्टी के नाम, मुख्यालय, पदाधिकारियों और संविधान में हुए सभी बदलावों की जानकारी समय-समय पर चुनाव आयोग को दी गई थी। उन्होंने अदालत को बताया कि इन दस्तावेजों की चुनाव आयोग द्वारा प्राप्ति की आधिकारिक रसीद (Acknowledgement) भी उनके पास मौजूद है। इसके बावजूद आयोग का यह कहना कि वर्ष 2018 का पार्टी संविधान उपलब्ध नहीं है, हैरान करने वाला और सुविधाजनक तर्क है। सिब्बल ने आगे कहा कि 23 जनवरी 2018 को हुए संगठनात्मक चुनाव, उद्धव ठाकरे का पार्टी प्रमुख के रूप में चयन और 23 उपनेताओं की नियुक्ति सहित सभी दस्तावेज चुनाव आयोग को सौंपे गए थे। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि 2018 में पार्टी संविधान में हुए बदलावों पर कोई आपत्ति नहीं थी, तो वर्ष 2023 में उन्हीं बदलावों को अचानक अलोकतांत्रिक कैसे बताया जा सकता है। उन्होंने यह भी दलील दी कि 2018 में पार्टी संविधान में हुए संशोधन एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में ही हुए थे। ऐसे में अब उन्हीं संशोधनों को चुनौती देना विरोधाभासी है। सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग ने ठाकरे गुट द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों का समुचित परीक्षण तक नहीं किया और बिना पूरी तरह जांच किए निर्णय सुना दिया। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी ठाकरे गुट के संगठनात्मक ढांचे से जुड़े कुछ तर्कों पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं और कहा कि इन पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले के सभी कानूनी पहलुओं की गहन समीक्षा के बाद ही अंतिम फैसला सुनाया जाएगा। इस बहुचर्चित मामले का फैसला महाराष्ट्र की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है। इसलिए पूरे राज्य के साथ-साथ देशभर की राजनीतिक निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर टिकी हुई हैं।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular

Recent Comments