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दिव्यांग बच्चों के समग्र विकास के लिए शीघ्र पहचान और समावेशी शिक्षा जरूरी: मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल

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मुंबई। दिव्यांग बच्चों के समग्र विकास के लिए उनकी समस्याओं की समय रहते पहचान, समय पर हस्तक्षेप और समावेशी शिक्षा की मजबूत नींव रखना बेहद आवश्यक है। इसी उद्देश्य से बुधवार को भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) और दिव्यांग सशक्तिकरण विभाग द्वारा संयुक्त रूप से तैयार ‘शीघ्र हस्तक्षेप एवं स्कूल-पूर्व तैयारी हेतु क्रॉस डिसएबिलिटी पाठ्यक्रम रूपरेखा’ पुस्तिका का लोकार्पण मुंबई स्थित यशवंतराव चव्हाण प्रतिष्ठान में किया गया। कार्यक्रम में राज्य के मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल, दिव्यांग सशक्तिकरण विभाग के सचिव डॉ. माणिक गुरसाल, महिला एवं बाल कल्याण विभाग की आयुक्त माधवी सरदेशमुख, प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की सह-संस्थापक फरीदा लांबे, राज्य परियोजना निदेशक संजय यादव, एससीईआरटी के निदेशक डॉ. हेमंत वसेकर सहित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
दिव्यांगता नहीं, पहले व्यक्ति के रूप में देखें
मुख्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों को सबसे पहले एक इंसान के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि केवल उनकी दिव्यांगता के आधार पर। उन्होंने कहा कि माता-पिता, शिक्षक और समाज को बच्चे को पहले एक बच्चे के रूप में स्वीकार करना चाहिए, उसके बाद उसकी विशेष आवश्यकताओं पर ध्यान देना चाहिए। दिव्यांगता किसी व्यक्ति की संपूर्ण पहचान नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व का केवल एक हिस्सा है। उन्होंने बताया कि इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए विभाग का नाम ‘डिपार्टमेंट ऑफ डिसएबिलिटी अफेयर्स’ से बदलकर ‘डिपार्टमेंट ऑफ एम्पावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज’ रखा गया है, ताकि दिव्यांगता के बजाय व्यक्ति के सशक्तिकरण पर अधिक जोर दिया जा सके।
जीवन के पहले 1,000 दिन सबसे महत्वपूर्ण
राजेश अग्रवाल ने कहा कि बच्चे के जीवन के पहले 1,000 दिन उसके शारीरिक और मानसिक विकास की नींव रखते हैं। यदि इस अवधि में उचित स्वास्थ्य सेवाएं, देखभाल, मार्गदर्शन और प्रारंभिक हस्तक्षेप मिले, तो उसके भविष्य के विकास में काफी मदद मिलती है। इसके लिए अभिभावकों, स्वास्थ्यकर्मियों, शिक्षकों और विशेषज्ञों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। उन्होंने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों से जुड़ी योजनाओं, छात्रवृत्तियों, भर्ती प्रक्रियाओं और अधिकारों के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ समाज में सकारात्मक और व्यक्ति-केंद्रित सोच विकसित करने की भी जरूरत है। मुख्य सचिव ने कहा कि पूर्ण दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए ब्रेल महत्वपूर्ण है, लेकिन शिक्षा को केवल ब्रेल तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। सुनने, बोलने, स्पर्श और व्यावहारिक गतिविधियों के माध्यम से भी उन्हें सीखने के समान अवसर मिलने चाहिए। उन्होंने इस धारणा को बदलने पर भी जोर दिया कि दृष्टिबाधित विद्यार्थी गणित, विज्ञान और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में आगे नहीं बढ़ सकते।
0 से 6 वर्ष के बच्चों के लिए विशेष पाठ्यक्रम
नई पुस्तिका में 0 से 3 वर्ष आयु वर्ग के बच्चों के लिए डेवलपमेंटली एप्रोप्रियेट प्रैक्टिस (DAP) पर आधारित ‘पहल (PEHAL)’ मॉडल तैयार किया गया है। वहीं 3 से 6 वर्ष आयु वर्ग के लिए NIPUN Inclusive के अंतर्गत समावेशी प्री-स्कूल शिक्षा के लिए विशेष गतिविधि आधारित पाठ शामिल किए गए हैं। बच्चों के शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए पंचकोश अवधारणा को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है।
विकास के पांच प्रमुख क्षेत्रों पर विशेष ध्यान
‘पहल’ पाठ्यक्रम में सीखने की क्षमता, सामाजिक एवं भावनात्मक विकास, भाषा और साक्षरता, शारीरिक विकास एवं स्वास्थ्य तथा संज्ञानात्मक विकास जैसे पांच प्रमुख क्षेत्रों को शामिल किया गया है। आयु के अनुसार विकास के अपेक्षित चरणों को तालिकाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है।इन विकासात्मक मानकों का उद्देश्य बच्चों की आपस में तुलना करना नहीं, बल्कि उनकी वर्तमान विकास स्थिति को समझने में अभिभावकों और विशेषज्ञों की मदद करना है, ताकि विकास में किसी प्रकार की देरी या समस्या होने पर समय रहते उचित हस्तक्षेप किया जा सके।
समावेशी शिक्षा को मिलेगा बढ़ावा
पाठ्यक्रम में क्रॉस डिसएबिलिटी दृष्टिकोण अपनाया गया है, जिससे विभिन्न प्रकार की दिव्यांगताओं वाले बच्चों की समान जरूरतों को ध्यान में रखते हुए समावेशी शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सकेगा। यूनिवर्सल डिजाइन फॉर लर्निंग (UDL) की अवधारणा पर आधारित गतिविधियों के माध्यम से अलग-अलग क्षमताओं वाले बच्चों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप सीखने के समान अवसर उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया है। यह हस्तपुस्तिका शीघ्र पहचान, समय पर हस्तक्षेप, अभिभावकों के सशक्तिकरण और स्कूल-पूर्व तैयारी को एक साथ जोड़ते हुए दिव्यांग बच्चों के साथ-साथ सभी बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा की मजबूत नींव तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

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