Tuesday, March 17, 2026
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“आपके पास स्कोप है, हमारे पास नहीं”— सदन में सीएम फडणवीस ने उद्धव ठाकरे को दिया साथ आने का ऑफर, बोले ‘2029 तक कुछ नहीं करना है’

मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा के मौजूदा सत्र के दौरान सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इसी क्रम में बुधवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे के बीच हुई एक दिलचस्प बातचीत ने राजनीतिक चर्चाओं को और गरम कर दिया। विधानसभा परिसर में जब दोनों नेताओं की आमने-सामने मुलाकात हुई, तो सीएम फडणवीस ने हंसी-ठिठोली के अंदाज़ में उद्धव ठाकरे को एक बार फिर साथ आने का न्यौता दे डाला। उन्होंने कहा- 2029 तक आपको कुछ नहीं करना है। हमारे पास विपक्ष में बैठने का कोई स्कोप नहीं है, लेकिन आपके पास सत्ता पक्ष में आने का स्कोप है। आप विचार कर सकते हैं। इस पर उद्धव ठाकरे ने मुस्कराते हुए कहा, यह सब बातें मज़ाक में हो रही थीं, इसलिए इसे गंभीरता से न लिया जाए।
2019 के बाद बदले राजनीतिक समीकरण
बता दें कि 2019 में शिवसेना और बीजेपी के बीच दशकों पुराना गठबंधन टूटा था। मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान के बाद शिवसेना (तत्कालीन अविभाजित) ने कांग्रेस और एनसीपी (अविभाजित) के साथ मिलकर सरकार बनाई थी, और उद्धव ठाकरे पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। शिवसेना का दावा था कि चुनाव पूर्व बीजेपी से “ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री” के समझौते की बात हुई थी, जिसे बीजेपी ने खारिज कर दिया था। इस मतभेद ने महा विकास अघाड़ी सरकार को जन्म दिया, जो जून 2022 तक चली।
2022 में सत्ता परिवर्तन
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना के विधायकों ने बगावत कर दी, जिसके बाद उद्धव ठाकरे की सरकार अल्पमत में आ गई। फ्लोर टेस्ट से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बीजेपी और शिंदे गुट ने गठबंधन कर सरकार बनाई, और शिंदे मुख्यमंत्री बने। अब जबकि सदन का सत्र चल रहा है, मुख्यमंत्री फडणवीस की यह टिप्पणी राजनीतिक संकेतों से भरी हुई मानी जा रही है। भले ही इसे “हंसी मजाक” में कहा गया हो, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में समीकरण पल भर में बदलते हैं, और ऐसे बयानों को नजरअंदाज करना आसान नहीं।
क्या यह सिर्फ मज़ाक था या आगे की बिसात का संकेत?
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो, यह टिप्पणी भविष्य में संभावित राजनीतिक पुनर्मिलन की पटकथा का एक हल्का संकेत भी हो सकता है। हालांकि, फिलहाल तो उद्धव ठाकरे ने इसे हल्के-फुल्के अंदाज़ में लिया है। लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति में दरवाज़े कभी पूरी तरह बंद नहीं होते।

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