
विश्वजीत राहा (स्वतंत्र टिप्पणीकार)
ओडिशा के ओडिशा ग्रामीण बैंक के मालीपोसी ब्रांच में चैंकाने वाला मामला सामने आया है जहाँ सिस्टम की सख्ती और कागजी नियमों के आगे एक आदिवासी गरीब की बेबसी उजागर हुई है। क्योंझर जिले में एक आदिवासी शख्स 27 अप्रैल, सोमवार को अपनी मृत बहन का कंकाल लेकर बैंक में उसके नाम पर पैसे निकालने पहुंच गया। यह घटना क्योंझर जिले के पटना ब्लॉक में स्थित ओडिशा ग्रामीण बैंक की मालीपोसी ब्रांच में हुई है। दियानाली गांव के जीतू मुंडा की बड़ी बहन कालरा मुंडा की मृत्यु 26 जनवरी 2026 को हुई थी। दरअसल जीतू मुंडा की 56 वर्षीय बहन कलरा मुंडा की शादी पड़ोसी जाजपुर जिले के सुकरु मुंडा से हुई थी। कलरा मुंडा और सुकरु मुंडा का एक बेटा था। लेकिन पति और बेटे की मौत के बाद वह अपने मायके दियानाली लौट आई थीं और दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करके जीवनयापन कर रही थीं। कुछ महीने पहले कलरा ने अपना एक बछड़ा बेचा था और इससे मिले 19300 रुपये अपने खाते में जमा किए थे।
दो महीने पहले कलरा मुंडा की मृत्यु हो गई और उनके भाई जीतू रकम निकालने के लिए बैंक पहुंचे। जीतू अपनी मृत बहन के खाते में पड़े इन्हीं पैसों को निकालना चाहता था। जीतू मुंडा को बताया कि वह कई बार बैंक गया और वहां के लोगों ने उसे खाताधारक को लाने के लिए कहा ताकि उसके नाम पर जमा राशि निकाला जा सके। हालांकि उसने उन्हें बताया कि उसकी मृत्यु हो चुकी है और फिर भी उन्होंने उसकी बात नहीं सुनी और उसे बैंक लाने पर अड़े रहे। इसलिए हताशा में आकर उसने कब्र से प्रमाण के लिए अपनी मृतक बहन का कंकाल निकाल लिया। हालांकि बैंक कर्मी के अनुसार उन्होंने जीतू से कानूनी दस्तावेज मांगे थे ताकि यह साबित हो सके कि जीतू मुंडा ही कलरा मुंडा का वास्तविक उत्तराधिकारी है।
ओडिशा पुलिस के अनुसार जीतू एक अनपढ़ आदिवासी है। उसे यह नहीं पता कि कानूनी वारिस या नॉमिनी क्या होता है। बैंक अधिकारी उसे मृत व्यक्ति के खाते से पैसे निकालने की प्रक्रिया ठीक से समझा नहीं पाए। सोमवार को जीतू गांव के श्मशान गया। उसने अपनी बहन की कब्र खोदी और उसके अवशेष निकाले। फिर कंकाल को कपड़े में लपेटकर कंधे पर रखा और करीब 3 किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंच गया। तेज धूप में यह मंजर देखकर लोगों की आंखें नम हो गईं
बेबसी में जीतू के द्वारा उठाये गये कदम लोग हैरान रह गए। मौके पर मौजूद लोगों ने बैंक की आलोचना की। उनका कहना था कि बैंक चाहे तो सरपंच से जांच करा सकता था या मानवीय आधार पर फैसला ले सकता था। हालांकि घटना के बाद पुलिस ने जीतू मुंडा को आश्वासन दिया कि वे उसकी मृत बहन के बैंक खाते से पैसे निकलवाने में मदद करेंगे। बाद में पुलिस की मौजूदगी में कंकाल को दोबारा कब्रिस्तान में दफना दिया गया।
गौरतलब है कि भारत में लावारिस खातों की बात करें तो 10 साल से अधिक समय से निष्क्रिय खातों में 72454 रूपये से अधिक की राशि है। वहीं एक अनुमान के मुताबिक 10 साल से कम अवधि के निष्क्रिय खातों के सबसे अधिक जनधन खाते हैं। सितंबर 2025 तक देश के विभिन्न बैंकों 56-03 करोड़ जनधन खातों में से लगभग 14-28 करोड़ यानि 26 फीसदी खाते निष्क्रिय हैं जिनमें लगभग 1-30 लाख रूपये जमा हैं। यह समझना मुश्किल नहीं कि जनधन खातों के अधिकतर खाताधारक ओडिशा के जीतू मुंडा जैसे लोगों के परिजनों के ही होंगे। एक अनुमान के मुताबिक भारत के विभिन्न बैंकों के निष्क्रिय खातों में वारिसान के न होने के कारण लगभग 2 लाख करोड़ से अधिक की राशि यूं ही पड़ी है। गौरतलब है कि लावारिस निष्क्रिय खातों के कानूनी वारिस या नॉमिनी के लिए बैंकों में जमा पैसा पाने का सरल प्रक्रिया है जिसमें नॉमिनी को आधार, पैनकार्ड व फोटो के साथ-साथ खाताधारक का मृत्यु प्रमाण पत्र जमा करना होता है। लेकिन यदि लावारिस खाते का कोई नॉमिनी नहीं है या नॉमिनी की भी मृत्यु हो चुकी हो तो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र की आवश्यकता होती है जो कि एक जटिल प्रक्रिया है जिसे जीतू मुंडा जैसे भोले-भाले लोग न समझ पाते हैं और न ही बना पाते हैं। उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनाना एक कानूनी प्रक्रिया है जो खर्चीली भी है। और आम आदमी न्यायिक प्रक्रिया से अनभिज्ञ भी होता है।
बहरहाल ओडिशा की यह घटना सिर्फ जीतू जैसे भोले-भाले लोगों की बेबसी भर नहीं है। यह हमारे बैंकिंग सिस्टम में शून्य मानवता वाली कार्यप्रणाली का एक जीता जागता उदाहरण है। कुछ लोग इसे बैंक के नियमों से बंधे होने का हवाला देकर कर्मचारियों के कृत्य को जायज ठहरा सकते हैं। लेकिन इस घटना ने बैंकिंग प्रणाली के संवेदनहीन चेहरे को उजागर कर दिया है। तो ऐसे में सवाल में बहुतेरे हैं। क्या बहन का कंकाल न लाने पर जीतू को कभी वह राशि मिल पाती? क्या हमारी बैंकिंग प्रणाली का संवेदनशील नहीं बनाया जाना चाहिए? क्या यह संभव है कि बैंक अशिक्षित व भोले-भाले खाताधारकों या उनके अघोषित वारिसों के मदद के लिए स्थानीय स्तर पर एक प्रणाली विकसित करे जो जीतू जैसे व्यक्ति को मदद कर सके? जीतू के मामले में बैंक द्वारा उसे नियम न समझा पाने का हवाला दिया गया जबकि बैंक के द्वारा कहा गया कि जीतू नियमों को समझ नहीं सका। ऐसे में क्या बैंक का यह दायित्व नहीं होना चाहिए ऐसे लोगों को समझाने के लिए स्थानीय समुदाय का सहयोग लिया जाय? बहरहाल ओडिशा की इस घटना ने बैंकिंग सिस्टम में कंकाल बन चुके जीरो मानवता पॉलिसी को उजागर कर दिया है। देखना है कि क्या हमारे देश के नीति नियंताओं के द्वारा इस दिशा में कोई ठोस पहल की जाती है या नहीं जिसे फिर किसी जीतू मुंडा को अपने किसी रिश्तेदार को कब्र से निकालने की आवश्यकता न पड़े।




