Saturday, May 2, 2026
Google search engine
HomeMaharashtra3 मई नारद जयंती: सूचना क्रांति के आदि संचारक देवर्षि नारद

3 मई नारद जयंती: सूचना क्रांति के आदि संचारक देवर्षि नारद

संजीव शर्मा
आज सूचना क्रांति के दौर में जब सूचना की रफ्तार इंटरनेट और सोशल मीडिया से तय हो रही है एवं सोशल मीडिया पर हर सेकंड लाखों खबरें, रील्स और पोस्ट वायरल हो रही हैं, तब यह सवाल दिलचस्प लगता है कि क्या प्राचीन काल में भी ऐसा कोई संचार तंत्र था? इसका उत्तर पौराणिक कथाओं में ही मिलता है। पौराणिक संदर्भों में देवर्षि नारद का व्यक्तित्व इस सवाल का सटीक जवाब प्रस्तुत करता है। उन्हें केवल एक ऋषि या भक्त के रूप में नहीं, बल्कि सूचना और संवाद के प्राचीन वाहक के रूप में भी देखा जाता रहा है। धार्मिक कथा कहानियों के अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और भगवान विष्णु के परम भक्त नारद मुनि तीनों लोकों,स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में निर्बाध विचरण करते थे। वे जहां भी जाते, वहां की घटनाओं, परिस्थितियों और संदेशों को एकत्र कर दूसरे स्थान तक पहुंचाते। यह कार्य आधुनिक पत्रकारिता की मूल परिभाषा से काफी हद तक मेल खाता है, सूचना जुटाना, उसका संप्रेषण करना और समाज को प्रभावित करना।
नारद मुनि की सबसे प्रमुख खासियत उनकी निष्पक्षता और गतिशीलता थी। वे देवताओं, असुरों और मनुष्यों सभी के बीच समान रूप से संवाद स्थापित करते थे। उनकी वीणा केवल संगीत का साधन नहीं, बल्कि संदेश प्रसार का माध्यम भी थी। यह आज के मोबाइल फोन और कैमरे की तरह उपयोगी थी। वे कथाओं और भजनों के जरिए सूचनाएं इस तरह प्रस्तुत करते थे कि वे जनमानस में गहराई तक उतर जाएं। कुछ वैसा ही जैसा आज पॉडकास्ट या वायरल कंटेंट करता है। आधुनिक भाषा में कहें तो वे वायरल न्यूज मेकर थे, जिनकी एक खबर पूरे ब्रह्मांड में तुरंत फैलकर आज की तरह वायरल हो जाती थी। पौराणिक कथाओं में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जो उनकी पत्रकारिता के विविध रूपों को स्पष्ट करते हैं। जैसे एक प्रसंग में वे महर्षि बाल्मीकि के आश्रम पहुंचकर उन्हें राम कथा सुनाते हैं। यही कथा आगे चलकर रामायण जैसे महाकाव्य की प्रेरणा बन जाती है। यह घटना आधुनिक संदर्भ में एक ‘डिटेल्ड फीचर स्टोरी’ या ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ की तरह देखी जा सकती है, जिसने इतिहास रच दिया।
इसी तरह महाभारत काल में नारद मुनि ने पांडवों और कौरवों दोनों पक्षों के बीच संवाद और सूचना का आदान-प्रदान किया। उन्होंने युधिष्ठिर को राज्य नीति और धर्म के विषय में सलाह दी, वहीं दूसरी ओर कौरवों की स्थिति का भी आकलन किया। यह भूमिका आज के इन्वेस्टिगेटिव पत्रकार से कम नहीं लगती। नारद मुनि केवल सूचना वाहक ही नहीं थे, बल्कि सामाजिक संवेदना के प्रतिनिधि भी थे। उन्होंने भक्त प्रह्लाद और ध्रुव जैसे पात्रों को भक्ति का मार्ग दिखाया और उनकी स्थिति को देवताओं तक पहुंचाया। यह आधुनिक पत्रकारिता के उस पहलू से मेल खाता है, जहां मीडिया कमजोर और वंचित वर्ग की आवाज़ बनता है। अगर सोशल मीडिया के नजरिए से देखें, तो नारद मुनि का कार्य और भी प्रासंगिक लगता है। वे उस दौर में बिना किसी तकनीक के त्वरित सूचना प्रसार करते थे। उनकी एक बात पूरे ब्रह्मांड में प्रभाव डालती थी,कुछ वैसा ही जैसा आज कोई पोस्ट वायरल हो जाती है। उनकी “नारायण-नारायण” की उद्घोषणा एक तरह से उनकी पहचान थी, जिसकी तुलना हम आज के हैशटैग से कर सकते हैं।
हालांकि नारद जी एवं आज के सोशल मीडिया के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर भी है। आज सोशल मीडिया में जहां फेक न्यूज, ट्रोलिंग और सनसनीखेज खबरें आम बात हो गई है, वहीं नारद मुनि का उद्देश्य हमेशा जनकल्याण और सत्य की स्थापना रहा। वे सूचना को हथियार नहीं, बल्कि सही संवाद का माध्यम मानते थे। वर्तमान डिजिटल युग में पत्रकारिता और सोशल मीडिया दोनों को नैतिकता की सख्त जरूरत है। नारद मुनि की तीनों लोकों की यात्राएँ हमें याद दिलाती हैं कि सच्चा संचारक वही है जो सूचना को हथियार नहीं, बल्कि समाज से जुड़ने का पुल बनाता है और धरातल पर जाकर आम लोगों की वास्तविकताओं से रूबरू कराता है। समसामयिक संदर्भ में बात करें तो नारद मुनि का उदाहरण यह संदेश देता है कि पत्रकारिता केवल खबर देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने की जिम्मेदारी भी है। निष्पक्षता, सत्य, विश्वसनीयता और जनहित जैसे मूल्य आज भी उतने ही जरूरी हैं जितने प्राचीन काल में थे।
शायद यही कारण है कि नारद जयंती को पत्रकारिता दिवस के रूप में मनाने की परंपरा विकसित हुई । यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है कि सूचना का सही उपयोग समाज को जोड़ सकता है, जागरूक बना सकता है और सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। देवर्षि नारद की जयंती के अवसर पर यह याद करना प्रासंगिक है कि पत्रकारिता कोई नया पेशा नहीं है। यह सृष्टि के आरंभ से चला आ रहा एक दिव्य कर्तव्य है। यदि आज का ‘मैराथन मीडिया’ नारद मुनि की निष्पक्षता, गतिशीलता और लोकमंगल की भावना को अपनाए, तो सोशल मीडिया भी ज्ञान और सद्भाव का साधन बन सकता है। (लेखक पीआईबी शिमला में सहायक निदेशक हैं)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments