HomeIndiaश्यामा प्रसाद मुखर्जी: राष्ट्र के चरमोत्कर्ष की यज्ञवेदी पर प्राणोत्सर्ग

श्यामा प्रसाद मुखर्जी: राष्ट्र के चरमोत्कर्ष की यज्ञवेदी पर प्राणोत्सर्ग

पत्रकार, लेखक व स्तंभकार- हेमेन्द्र क्षीरसागर
डां श्यामाप्रसाद मुखर्जी ऐसे महान देशभक्त थे जिन्होंने राष्ट्र के चरमोत्कर्ष, एकता और अखण्डता की यज्ञवेदी पर अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया। वह एक साथ ही शि‍क्षाविद्, लेखक, सासंद, राजनीतिज्ञ और मानवतावादी कट्टर देशभक्त थे। इन्होंने विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की और शीध्र ही एक प्रख्यात शि‍क्षाविद् और प्रशासक के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। उनकी इस उपलब्धि को मान्यता उस समय प्राप्त हुई जब 1934 में कलकत्ता विश्विद्यालय के कुलपति नियुक्त होने वालों में वह सबसे कम आयु के थे। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी स्वतंत्र भारत के निर्माताओं में से थे। उनका जन्म 6 जुलाई 1901 को हुआ था। वे उन नेताओं में से थे, जो खुद आगे आकर जोखिम झेलते हैं। उनके लिए भारत प्रथम था और भारत की अखण्डता और वैभव ही प्रमुख लक्ष्य। जान दे दी, पर कश्मीर जाने नहीं दिया। मंत्रीमंडल को ठोकर मार दी, लेकिन सिंद्धातों से समझौता नहीं किया। हॉं, मैं हिन्दू हॅूं इस देश का राष्ट्रत्व हिन्दू हैं। यह अटल सत्य हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि हिन्दू किसी दूसरे मजहब या उपासना पद्धति के विरूद्ध हैं। ऐसा होता तो इतिहास ही कुछ और होता। कश्मीर हर हिन्दुस्तानी का हैं। हर दिल में कश्मीर के लिए दर्द उठना चाहिए जो हनीफुद्दीन और अजय आहूजा के दिलों में उठा। डॉं. मुखर्जी ने अपने जीवन और अपने बलिदान, दोनों से ही इस देश को प्राण दिए। उनके लिए भारतीय होने का अर्थ राजनीति के कपट जाल में फॅंसना नहीं, वरन् उस कपट जाल को तोडना था। बहुत कम लोगों को यह जानकारी होगी कि आज जो पंजाब और बंगाल का हिस्सा भारत में दिखता हैं, उसके पीछे डॉं. श्यामाप्रसाद मुखजी का जुझारूपन और आंदोलन मुख्य कारण रहे हैं। डॉं. मुखर्जी के वह शब्द इतिहास में प्रसिद्ध हैं, जब उन्होंने कहा था, ‘ कांग्रेस ने हिन्दुस्तान का बॅंटवारा किया और मैंने पाकिस्तान का।’ इस देश का दुर्भाग्य रहा कि स्वतंत्र, किन्तु खंडित भारत की कमान उस व्यक्ति के हाथों में सौंपी गई, जिसे भारतीयता किवां हिन्दुत्व से चिढ थी और स्वयं को देश का अंतिम ब्रिटिश शासक कहलाने में गर्व का अनुभव करता था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने देखा कि विभाजन की भीषण त्रासदी झेलकर जो हिन्दु भारत पहॅुंच रहे हैं और जो पाकिस्तान में रह गए हैं, उनके प्रति पंडित नेहरू बेहद उपेक्षपूर्ण और बहुत हदतक निर्मम नीति अपना रहे हैं। इस बिन्दु पर सरदार पटेल और पं. नेहरू में गम्भीर मतभेद पैदा हो गए थे। सरदार पटेल तो यहॉं तक चाहते थे कि पूर्वी पाकिस्तान से कुछ जमीन ले लेनी चाहिए। भले ही इसके लिए सशस्त्र पुलिस कार्यवाही ही क्यों न करनी पडे पं. नेहरू ने लियाकत अली से समझौताकर हिन्दुओं के भविष्य को पूरी तरह पाकिस्तानी दरिन्दों के हाथों में छोड दिया। यह देखकर डॉं. श्यामाप्रसाद मुखर्जी आगबबूला हो उठे और उन्होंने उद्योग तथा आपूर्ति मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया। अपना त्यागपत्र देते समय उन्होंने इसके पीछे के कारणों का विस्तार से उल्लेख किया जो आज भी ऐतिहासिक तथा प्रेरणप्रद एक दस्तावेज के रूप में माना जाता हैं। संकल्पित, मंत्रीमण्डल से त्यागपत्र देने के बाद डॉं. मुखर्जी ने संसद में प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने का निश्चय किया। लेकिन वह जल्दी ही समझ गए कि प्रतिपक्ष की प्रभावी भूमिका निभाने के लिए संगठित पार्टी बनाना जरूरी हैं। इसी उद्देश्य से वह प्रतिपक्ष के राजनीतिक मंच के गठन की संभावनाओं को तलाशने की ओर अग्रसर हुए। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी किसी सशक्त व्यक्तित्व के नेतृत्व में राजनीतिक दल प्रारंभ किए जाने की जरूरत महसूस कर रहा था। डॉं. मुखर्जी और स्वयंसेवक संघ दोनों ही जिस बात की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। वह समान थी और इसी में से अक्टूबर, 1951 में भारतीय जनसंघ का उद्भव हुआ जिसके संस्थापक अध्यक्ष डॉं. मुखर्जी थे। डॉं. मुखर्जी को अपने जीवन में बडी चुनौती का समना दो वर्ष बाद 1953 में करना पडा। जम्मू और कश्मीर में शेख अब्दुल्ला की पृथकतावादी राजनीतिक गतिविधियों से उभरी अलगाववादी प्रवृत्यिां 1952 तक बल पकडने लगी थीं, जिससे राष्ट्रीय मानस विक्षुब्ध हो उठा। डॉं. मुखर्जी ने प्रजा परिषद् के सत्याग्रह को पूर्ण दिया जिसका उद्देष्य जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना था। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झण्डा था, अलग संविधान था और वहां का मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री कहलाता था।  डॉं. मुखर्जी ने जोरदार नारा बुलन्द किया थाः ‘‘ एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान, एक देश में दो विधान, नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे। अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त कियाः या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।’’ अपने संकल्प को पूरा करने के लिए उन्होंने नई दिल्ली में नेहरू सरकार और श्रीनगर में शेख अब्दुला की सरकार को चुनौती देने का निश्चय किया और पं. नेहरू से कहा कि वे जम्मू जरूर जाएंगे और बिना ‘परमिट’ के जाएंगे। बलिवेदी, 11 मई को रावी पर करते समय ही लखनपुर में डॉं. मुखर्जी को गिरफ्तार कर श्रीनगर जेल ले जाया गया। 40 दिन तक न उन्हें चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई और न अन्य बुनियादी सुविधाएं दी गई। भारत का यह शेर श्रीनगर की जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में 23 जून 1953 को चिरनिद्रा में सोया गया। श्रद्धांजलि स्वरूप नरेंद्र मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 और 35 ए द्वारा दिए गए विशेष दर्जे को हटाने के लिए संसद ने 5 अगस्त, 2019 को मंजूरी दी। यह ऐतिहासिक भूल को ठीक करने वाला ऐतिहासिक कदम था। 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments