Wednesday, April 22, 2026
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तकनीक के नाम पर लगाए गए स्मार्ट मीटर अब उपभोक्ताओं को दे रहे दर्द

भूपेंद्र सिंह/उन्नाव, उत्तर प्रदेश। शहर की गलियों से लेकर गांवों के आंगनों तक एक नई तरह की खामोश बेचैनी फैल रही। बिजली है, लेकिन भरोसा नहीं; मीटर है, लेकिन हिसाब समझ से बाहर। तकनीक के नाम पर लगाए गए स्मार्ट मीटर अब उपभोक्ताओं के लिए राहत नहीं, बल्कि रोज़ की परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। सवाल यह नहीं कि मीटर स्मार्ट है या नहीं, सवाल यह है कि क्या व्यवस्था भी उतनी ही संवेदनशील और जवाबदेह है?
गौरतलब है कि करीब एक वर्ष पहले विद्युत विभाग द्वारा यह कहकर स्मार्ट मीटर लगाने शुरू किए गए थे कि अब इन मीटरो में कोई गड़बड़ी नहीं होगी। उपभोक्ताओं के धन का दुरुपयोग नहीं होगा। यह मीटर स्मार्ट है, एक एक पाई और एक-एक यूनिट का हिसाब रखता है। विद्युत विभाग के ठेकेदार की मीठी-मीठी बातों में आकर विद्युत उपभोक्ता अपने-अपने घरों पर स्मार्ट मीटर लगवाने लगे। लेकिन पहले ही महीने में निर्धारित विद्युत बिल से चार से पांच गुना अधिक धनराशि जमा करने का संदेश उपभोक्ताओं के मोबाइल पर आने लगे। इस समस्या का समाधान होता कि इससे पहले विभाग ने स्मार्ट मीटरों को प्रीपेड कर दिया। नगर के मोहल्ला गढ़ी निवासी मोहम्मद रेहान ने बताया कि उनके यहां जबरन प्रीपेड स्मार्ट मीटर लगाया गया। इसके बाद उन्होंने विभाग के खाते में एडवांस पैसा जमा कर दिया। खाते में 1068 रुपए होने के बावजूद उनकी बिजली कट गई। अब वह पावर हाउस के चक्कर लगा रहे हैं। लेकिन उनकी समस्या का समाधान करने वाला कोई नहीं है । नगर के मदन , राम सिंह , जगदीश, जाहिद, बालकिशन आदि उपभोक्ताओं का आरोप है कि बिना स्पष्ट खपत के भी बैलेंस तेजी से कट रहा है। जिन घरों में पहले महीने भर का बिल हजार से डेढ़ हजार रुपए आता था, वहां अब कुछ ही दिनों में दो से तीन हजार रुपए का रिचार्ज खत्म हो जा रहा है। ऐसे में उपभोक्ता मजबूर होकर अपने काम-धंधे छोड़कर पावर हाउस के चक्कर लगाने को विवश हैं। लेकिन यहां भी तस्वीर उम्मीद जगाने वाली नहीं है। उपभोक्ताओं का कहना है कि शिकायत लेकर पहुंचने पर उन्हें समाधान नहीं, बल्कि कम्प्यूटर स्क्रीन पर दिखता डेटा थमा दिया जाता है। एसी कमरों में बैठे अधिकारी कंप्यूटर के आंकड़ों को अंतिम सत्य मानते हुए उपभोक्ताओं की बातों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। कई पीड़ितों ने आरोप लगाया कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से लेने के बजाय उनका उपहास किया जाता है—जैसे उपभोक्ता नहीं, कोई असुविधा पैदा करने वाला तत्व हों। सपा नेता इमरान सिद्दीकी, सुरेश पाल व सलीमुर्रहमान कहते हैं कि यह वही उपभोक्ता हैं, जिनके पैसे से व्यवस्था चलती है। लेकिन आज वही उपभोक्ता अपने ही अधिकारों के लिए दर-दर भटक रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या तकनीक का इस्तेमाल सुविधा देने के लिए हुआ है या जिम्मेदारी से बचने का एक नया माध्यम बन गया है?

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