Friday, March 20, 2026
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ठाकरे भाइयों की एकजुटता से महायुति सरकार में खलबली, संजय राउत बोले- बुरी तरह घबरा गए फडणवीस

मुंबई। वर्ली में आयोजित ‘आवाज मराठिचा’ विजय रैली ने महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया मोड़ लाने का संकेत दिया है। 20 वर्षों बाद पहली बार एक ही मंच पर साथ आए शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट) के प्रमुख उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे की एकजुटता ने राजनीतिक हलकों में नई हलचल पैदा कर दी है। रविवार को राज्यसभा सांसद संजय राउत ने दावा किया कि ठाकरे भाइयों की एकता से महायुति सरकार, विशेष रूप से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, “बुरी तरह घबरा गए हैं। रैली में संजय राउत ने कहा-यह सिर्फ एक रैली नहीं, मराठी अस्मिता की जीत है। ठाकरे भाइयों की एकजुटता ने राज्य सरकार को हिंदी थोपने के फैसले से पीछे हटने के लिए मजबूर किया। रैली के मंच से उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट किया कि यह एक अस्थायी साथ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक एकता की शुरुआत है। उन्होंने कहा हम साथ आए हैं, और अब साथ रहेंगे। मुंबई महानगरपालिका और महाराष्ट्र की सत्ता को भी हम मिलकर हासिल करेंगे। यह बयान आगामी मुंबई महानगरपालिका चुनाव और अन्य नगर निकाय चुनावों की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ठाकरे ने अपने संबोधन में इसे केवल “भाषा की नहीं, बल्कि अस्मिता और अधिकार की लड़ाई” बताया।
फडणवीस पर पलटवार और दक्षिण भारत से समर्थन
रैली के बाद उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्धव ठाकरे के भाषण को “रुदाली” कहकर तंज कसा। इस पर पलटवार करते हुए संजय राउत ने तीखा व्यंग्य किया- अब फडणवीस और शिंदे को भी अपना ‘रुदाली कार्यक्रम’ शुरू कर देना चाहिए। राउत ने यह भी खुलासा किया कि दक्षिण भारत के कई प्रमुख नेताओं ने ठाकरे भाइयों की इस पहल का समर्थन किया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के.स्टालिन सहित कई नेताओं ने केंद्र सरकार द्वारा भाषा के थोपे जाने के खिलाफ एकजुट संघर्ष का समर्थन जताया है।
भाषा की लड़ाई या सियासी समीकरण?
‘आवाज मराठिचा’ रैली मूलतः राज्य सरकार के उस फैसले के विरोध में थी जिसमें पहली कक्षा से ही हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में लागू करने की योजना बनाई गई थी। हालांकि अब यह आंदोलन सिर्फ भाषा विरोध तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि महाराष्ट्र की सियासत में संभावित ठाकरे-मनसे गठबंधन की नींव के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यदि यह गठबंधन अगले चुनावों तक टिकता है, तो यह न केवल बीएमसी में, बल्कि राज्य की राजनीति में भी भाजपा और शिंदे गुट के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

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