
महिला आयोग के गठन के पीछे मूल उद्देश्य यह था कि देश की महिलाओं और बेटियों के साथ कहीं भी कोई अन्याय, उत्पीड़न या असुरक्षा की स्थिति उत्पन्न हो, तो वह संस्था तुरंत संज्ञान लेकर प्रभावी कार्रवाई करे। साथ ही, यह भी अपेक्षा की गई थी कि महिला आयोग समाज में जागरूकता फैलाने, छात्राओं और कामकाजी महिलाओं को सुरक्षा और अधिकारों के प्रति शिक्षित करने का कार्य करेगा। लेकिन वास्तविकता में इन उद्देश्यों और धरातल के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। इस अंतर का एक प्रमुख कारण यह है कि अक्सर महिला आयोग के अध्यक्ष पद पर नियुक्तियाँ योग्यता और निष्पक्षता के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक निष्ठा के आधार पर की जाती हैं। सत्ता में बैठी सरकारें अपने विचारधारा से जुड़ी महिलाओं को इस पद पर नियुक्त करती हैं, जिन्हें मंत्री स्तर की सुविधाएं प्राप्त होती हैं। परिणामस्वरूप, कई बार यह पद जनसेवा के बजाय सुविधा-भोग और सत्ता को संतुष्ट करने का माध्यम बनकर रह जाता है। ऐसे में जब सत्ता से जुड़े लोगों पर ही गंभीर आरोप लगते हैं, तो महिला आयोग की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। देश के विभिन्न राज्यों में महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं को देखें तो यह प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है। अनेक मामलों में, जहाँ त्वरित और सशक्त हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है, वहाँ महिला आयोग की सक्रियता नगण्य दिखाई देती है। यह केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक स्तर पर देखने को मिलता है। यदि महिला आयोग का उद्देश्य केवल कागजी कार्रवाई या बाद में प्रतिक्रिया देना रह जाए, तो उसका अस्तित्व अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। महिला सुरक्षा को लेकर सरकारों द्वारा किए गए बड़े-बड़े दावे भी तब सवालों के घेरे में आ जाते हैं, जब जमीनी हकीकत उससे मेल नहीं खाती। यदि किसी राज्य में महिलाओं के प्रति अपराध लगातार बढ़ रहे हों, तो यह केवल कानून व्यवस्था का नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता का भी संकेत है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि संबंधित संस्थाएं—जैसे महिला आयोग—सिर्फ बयान देने तक सीमित न रहें, बल्कि सक्रिय रूप से समाज के विभिन्न वर्गों के बीच जाकर वास्तविक स्थिति का आकलन करें। महिला आयोग की भूमिका केवल शिकायतों पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे स्कूलों, कॉलेजों, कार्यस्थलों, सार्वजनिक स्थानों—जैसे जिम, ब्यूटी पार्लर, स्पा, कार्यालयों—में जाकर महिलाओं की सुरक्षा स्थिति को समझना चाहिए। जमीनी स्तर पर संवाद स्थापित करना, जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करना और ठोस सुझाव देना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। यदि यह कार्य नहीं किया जाता, तो आयोग की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। हालांकि, केवल महिला आयोग को ही दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। सरकारों की प्राथमिकताएं भी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। जब शासन का मुख्य उद्देश्य केवल चुनाव जीतना बन जाए और प्रशासनिक व सामाजिक मुद्दे पीछे छूट जाएं, तो कानून व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा प्रभावित होती है। लोकतंत्र में संस्थाओं की निष्पक्षता और स्वतंत्रता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन यदि इन संस्थाओं पर राजनीतिक प्रभाव हावी हो जाए, तो उनकी विश्वसनीयता कमजोर पड़ने लगती है। इसी संदर्भ में अन्य संवैधानिक और अर्ध-स्वायत्त संस्थाओं—जैसे चुनाव आयोग या विभिन्न जांच एजेंसियों—की निष्पक्षता पर भी समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। लोकतंत्र की मजबूती इन संस्थाओं की पारदर्शिता और निष्पक्ष कार्यप्रणाली पर निर्भर करती है। यदि जनता का विश्वास इन संस्थाओं से डगमगाने लगे, तो यह लोकतांत्रिक ढांचे के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। अंततः, यह आवश्यक है कि महिला आयोग सहित सभी संस्थाएं अपने मूल उद्देश्यों की ओर लौटें। नियुक्तियों में पारदर्शिता, कार्यप्रणाली में जवाबदेही और जमीनी स्तर पर सक्रियता—ये तीनों तत्व मिलकर ही किसी संस्था को प्रभावी बना सकते हैं। महिलाओं की सुरक्षा केवल कानून बनाने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उन कानूनों के सही और निष्पक्ष क्रियान्वयन से होती है। जब तक यह सुनिश्चित नहीं किया जाएगा, तब तक दावे और वास्तविकता के बीच की खाई बनी रहेगी। लोकतंत्र की सच्ची शक्ति उसकी संस्थाओं में निहित होती है। यदि वे निष्पक्ष, संवेदनशील और सक्रिय हों, तो समाज में न्याय और सुरक्षा की भावना मजबूत होती है। लेकिन यदि वे निष्क्रिय या पक्षपातपूर्ण हो जाएं, तो सबसे अधिक नुकसान आम नागरिक—विशेषकर महिलाएं—को उठाना पड़ता है। इसलिए समय की मांग है कि इन संस्थाओं का पुनर्मूल्यांकन हो और उन्हें वास्तव में जनहित के अनुरूप कार्य करने के लिए सशक्त बनाया जाए।




