
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पर्याप्त और ठोस साक्ष्यों के बिना किसी भी प्राधिकरण को लापरवाही के आधार पर मुआवज़ा देने का अधिकार नहीं है। अदालत ने महाराष्ट्र स्टेट ह्यूमन राइट्स कमीशन (एसएचआरसी) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (बीएमसी) को वर्ष 2015 में माहिम में हुए सड़क हादसे में घायल एक महिला को 10 लाख रुपये मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने कहा कि आयोग ने रिकॉर्ड में पर्याप्त समर्थन सामग्री के अभाव के बावजूद बीएमसी पर लापरवाही का आरोप लगाकर “अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर” जाकर आदेश पारित किया। यह प्रकरण 6 अप्रैल 2015 को हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है। शिकायतकर्ता जी. डिसूज़ा अपनी पत्नी मर्लिन के साथ बांद्रा से दादर दोपहिया वाहन पर जा रहे थे। माहिम जंक्शन के पास कथित रूप से वाहन गड्ढे के कारण फिसल गया, जिससे दोनों गिर पड़े। हादसे में मर्लिन के सिर में गंभीर चोट आई और उन्हें लंबे समय तक उपचार कराना पड़ा।डिसूज़ा ने मानवाधिकार आयोग में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि दुर्घटना सड़क की खराब स्थिति और गड्ढों के कारण हुई, जिसके लिए बीएमसी की लापरवाही जिम्मेदार है। पुलिस की एक रिपोर्ट में भी उल्लेख किया गया कि वाहन गड्ढे के कारण “स्किड” हुआ। हालांकि, बीएमसी ने आयोग के समक्ष इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि जिस स्थान पर बाइक फिसली, वहां कोई निर्माण या मरम्मत कार्य नहीं चल रहा था। निगम ने अपने अधिकारी की साइट विज़िट रिपोर्ट और आसपास के दुकानदारों के बयान प्रस्तुत किए।
आयोग का आदेश और न्यायालय की टिप्पणी
एसएचआरसी ने जनवरी 2018 में शिकायत को स्वीकार करते हुए नगर आयुक्त को मानवाधिकार उल्लंघन के आधार पर 10 लाख रुपये मुआवज़ा देने का निर्देश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए बीएमसी की ओर से अधिवक्ता यशोदीप देशमुख ने तर्क दिया कि मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के तहत आयोग की शक्तियां केवल सिफारिश देने तक सीमित हैं और ठोस प्रमाण के अभाव में लापरवाही तय नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि आयोग एक फैक्ट-फाइंडिंग संस्था है और वह सार्वजनिक कानून के तहत मुआवज़ा देने के लिए “संवैधानिक न्यायालय” की भूमिका नहीं निभा सकता। खंडपीठ ने पुलिस और नगर निकाय की रिपोर्टों की समीक्षा के बाद पाया कि किसी भी दस्तावेज़ में बीएमसी की लापरवाही निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं होती। अदालत ने टिप्पणी की, “हमें ऐसा कोई सामग्री नहीं मिला जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सके। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवज़ा “किसी अनुग्रह या इनाम” के रूप में नहीं दिया जाता, बल्कि विधिसम्मत प्रक्रिया और दोष सिद्ध होने के बाद ही प्रदान किया जाता है।
पीड़ित को सिविल कोर्ट जाने की स्वतंत्रता
हालांकि, अदालत ने पीड़ित पक्ष को सिविल अदालत में लापरवाही साबित कर हर्जाने की मांग करने की स्वतंत्रता दी है। इसके साथ ही 19 जनवरी 2018 को पारित एसएचआरसी का आदेश रद्द कर दिया गया। यह निर्णय स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक निकायों की जवाबदेही तय करने के लिए विधिक प्रक्रिया और साक्ष्यों की अनिवार्यता सर्वोपरि है।




