
मुंबई। स्ट्रीट वेंडर्स नीति में गंभीर खामियों को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों के बाद महाराष्ट्र सरकार ने एक व्यापक और एक समान योजना तैयार करने के लिए 12 सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब नगर निकायों द्वारा अवैध फेरीवालों के खिलाफ अभियान तेज किया गया है। बृहन्मुंबई क्षेत्र में अनुमानित करीब 7 लाख स्ट्रीट वेंडर्स कार्यरत हैं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था के तहत केवल लगभग 99 हजार वेंडर्स को ही आधिकारिक मान्यता मिली है। रिट याचिका संख्या 3890/2021 की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 26 मार्च को राज्य की 2017 की योजना को अधूरा बताते हुए उसकी कड़ी आलोचना की थी। अदालत ने कहा था कि योजना में स्ट्रीट वेंडर्स (आजीविका का संरक्षण और स्ट्रीट वेंडिंग का विनियमन) अधिनियम, 2014 की धारा 38 और अनुसूची-II के महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल नहीं किए गए हैं। इन प्रावधानों में वेंडर्स के सर्वेक्षण, प्रमाण पत्र और पहचान पत्र जारी करने, शुल्क निर्धारण, राजस्व संग्रह, लाइसेंस की वैधता और नवीनीकरण जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। कोर्ट ने यह भी पाया कि योजना में लाइसेंस जारी करने की प्रक्रिया, बेदखली के नियम, जब्त सामान की वापसी, पुनर्वास और सामाजिक ऑडिट जैसे अहम पहलुओं पर स्पष्टता का अभाव है। इन टिप्पणियों के बाद शहरी विकास विभाग ने नगर प्रशासन निदेशालय के आयुक्त की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है। इस समिति में मुंबई, नागपुर, ठाणे और छत्रपति संभाजीनगर सहित कई नगर निगमों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं, साथ ही मालेगांव, बदलापुर, खामगांव, अलीबाग और वाडा के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है। समिति को एक महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। इसके तहत 2017 की नीति की कमियों की समीक्षा, नए मसौदे को कानूनी प्रावधानों के अनुरूप बनाना और अन्य राज्यों की सर्वोत्तम प्रथाओं का अध्ययन करना शामिल है। अंतिम अधिसूचना से पहले मसौदा योजना को स्थानीय निकायों और टाउन वेंडिंग समितियों (TVCs) के साथ साझा किया जाएगा। साथ ही, स्थानीय प्रशासन को TVCs के गठन, वेंडर्स के सर्वेक्षण और आवश्यकतानुसार चुनाव कराने के निर्देश भी दिए गए हैं। सरकार का उद्देश्य है कि नई नीति के माध्यम से स्ट्रीट वेंडर्स की आजीविका की सुरक्षा के साथ-साथ शहरी व्यवस्था और नियमन के बीच संतुलन स्थापित किया जा सके।




