Saturday, May 23, 2026
Google search engine
HomeCrimeहद हो गई! सीमा पर देश बचाने वाले जवान को सिस्टम से...

हद हो गई! सीमा पर देश बचाने वाले जवान को सिस्टम से लड़ना पड़ामां का कटा हाथ लेकर दफ्तर पहुंचा बेटा, तब भी सोती रही पुलिस

इंद्र यादव/कानपुर, उत्तर प्रदेश। कहते हैं कि देश की सीमा पर खड़ा जवान जब बंदूक थामता है, तो पूरा देश चैन की नींद सोता है। लेकिन जब उसी जवान के परिवार के साथ अन्याय हो और उसे न्याय के लिए अपने ही देश की पुलिस और स्वास्थ्य महकमे के आगे गुहार लगानी पड़े, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है। कानपुर में हाल ही में घटी एक घटना ने सरकारी सिस्टम, ढुलमुल पुलिसिया कार्रवाई और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही की पोल खोलकर रख दी है। मामला इतना गंभीर हो गया कि Indo-Tibetan Border Police (ITBP) के लगभग 40 से 50 हथियारबंद जवानों को अपने ही साथी को न्याय दिलाने के लिए कानपुर पुलिस कमिश्नरेट परिसर का घेराव करना पड़ा। करीब एक घंटे तक चले इस तनावपूर्ण माहौल ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जब देश की सेवा में तैनात वर्दीधारियों को न्याय के लिए यह रास्ता अपनाना पड़ रहा है, तो एक आम नागरिक की बिसात ही क्या है? दरअसल, ITBP कैंप में तैनात कमांडो विकास सिंह की मां निर्मला देवी का इलाज टाटमिल चौराहा स्थित Krishna Hospital में चल रहा था। आरोप है कि डॉक्टरों की घोर लापरवाही के कारण इलाज के दौरान उनकी मां के हाथ में संक्रमण इस कदर फैल गया कि डॉक्टरों को उनका हाथ काटना पड़ गया। एक बेटे के लिए इससे बड़ा दर्द क्या होगा कि उसकी मां को गलत इलाज के कारण अपना अंग गंवाना पड़ा। न्याय की उम्मीद में कमांडो विकास सिंह 19 मई को अपनी मां का कटा हुआ हाथ लेकर सीधे पुलिस कमिश्नर कार्यालय पहुंच गए। इस विचलित कर देने वाले दृश्य ने हर किसी को झकझोर दिया, लेकिन शायद हमारी सुस्त व्यवस्था को जगाने के लिए यह भी काफी नहीं था। पुलिस कमिश्नर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को जांच के लिए सौंप दिया। स्वास्थ्य विभाग ने एक जांच कमेटी भी बनाई, लेकिन जैसा कि अक्सर सरकारी विभागों में होता है, कमेटी की रिपोर्ट आई मगर उसमें कुछ भी स्पष्ट नहीं था। रिपोर्ट में न किसी की जवाबदेही तय की गई और न ही अस्पताल प्रबंधन पर कोई सख्त कार्रवाई हुई। जांच के नाम पर इस कथित “लीपापोती” ने पीड़ित जवान और उसके साथियों के सब्र का बांध तोड़ दिया। जब लगा कि कानून के रखवाले ही रेंग-रेंग कर चल रहे हैं, तो ITBP के जवान अपने साथी के समर्थन में भारी संख्या में कमिश्नरेट दफ्तर पहुंच गए। परिसर में हर तरफ हथियारबंद जवानों की मौजूदगी से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। यह घटना सिर्फ एक अस्पताल की लापरवाही या पुलिस की सुस्ती का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे सामाजिक और प्रशासनिक ढांचे के खोखलेपन को भी उजागर करती है। आज कई निजी अस्पताल सेवा भाव भूलकर केवल पैसा कमाने का माध्यम बन चुके हैं। छोटी सी लापरवाही किसी की जिंदगी तबाह कर देती है, लेकिन रसूख और प्रभाव के दम पर कई संस्थान बच निकलते हैं। सरकारी विभागों में जांच कमेटियों का गठन कई बार केवल मामले को शांत करने या समय बिताने के लिए किया जाता है। गोलमोल रिपोर्ट तैयार करना व्यवस्था की कमजोरी बन चुका है। इस मामले में पीड़ित एक केंद्रीय बल का जवान था, जिसके समर्थन में उसके साथी खड़े हो गए, तब प्रशासन हरकत में आया। सवाल यह है कि यदि यही घटना किसी गरीब या आम नागरिक के साथ हुई होती, तो क्या उसकी आवाज कभी अधिकारियों तक पहुंच पाती? जवानों के कड़े रुख और बढ़ते दबाव को देखते हुए आखिरकार पुलिस कमिश्नर, CMO और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के बीच आनन-फानन में लंबी बैठक हुई। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए प्रशासन ने अब CMO को दोबारा निष्पक्ष जांच करने के निर्देश दिए हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि अस्पताल की तरफ से कितनी बड़ी लापरवाही हुई थी। कानपुर की इस घटना ने साफ कर दिया है कि हमारी सरकारी व्यवस्था में जब तक बड़ा दबाव न बने, तब तक फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। यदि देश के जवानों और आम नागरिकों का व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखना है, तो जांच के नाम पर समय काटने की संस्कृति को बदलना होगा और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments