
गिरगिट को बार-बार रंग बदलने की कहावत वर्तमान में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप हर घंटे रंग बदलने लगे हैं, उन पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है। पहले पर्यावरण संगठन से नाता तोड़ा, फिर यूक्रेन को रूस के साथ युद्ध में अकेला छोड़ दिया। यहां तक कि नाटो के संदर्भ में उनके बयान बदलते रहे हैं। नाटो संगठन का एक भी देश ट्रंप पर विश्वास नहीं करता। पाकिस्तान-भारत युद्ध ऑपरेशन सिंदूर के समय से लेकर लगभग पचासों बार कहा, मैंने भारत-पाकिस्तान को टैरिफ का डर दिखाकर युद्ध रुकवाया, फिर बोलने लगे, दोनों परमाणु संपन्न राष्ट्रों के बीच युद्ध नहीं रुकवाया होता, तो करोड़ों लोग मारे जाते। भारत सरकार द्वारा सटीक प्रतिक्रिया या फिर ट्रंप की बात को खुलकर झूठा बताया गया होता, तो निश्चित ही वे बार-बार युद्ध रुकवाने का श्रेय नहीं ले पाते। अगर भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवा सकते थे, तो सवाल उठता है, रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध इतना लंबा क्यों चला, क्यों नहीं रुकवा दिया। सच तो यह है कि उन्होंने ही यूक्रेन को बीच मझधार में छोड़ दिया। इसके बाद टैरिफ वॉर शुरू कर दिया, तमाम देशों पर 25 प्रतिशत टैरिफ थोप दिया। यहां तक कि रूस से तेल लेने पर भारत के ऊपर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया। इसी बीच अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टैरिफ लगाना उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर घोषित किया, तब टैरिफ 15 प्रतिशत ले आए। लेकिन महा धूर्त ट्रंप कहां रुकने वाले थे, अब तमाम राष्ट्रों की जांच कराने में लग गए। ईरान पर बी-2 बम वर्षक विमान से हमला करके ईरान पर कथित रूप से परमाणु बम बनाने का आरोप लगाया और हमला कर दिया। इजरायल ने ईरान पर हमला तेज कर दिया, तब ट्रंप इजरायल का साथ पूरी शिद्दत से देने लगे थे। ईरान ने अपने सस्ते खिलौने ड्रोन से अरब राष्ट्रों में अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठानों पर हमला कर काफी नुकसान पहुंचाया। ट्रंप ने पहले सोचा था, ईरान के टॉप लीडर अयातुल्लाह खामनेई को मारकर वे ईरान में सत्ता परिवर्तन करा लेंगे, मगर ईरान ने एक साथ ही अमेरिका और इजरायल का सुरक्षा कवच तोड़कर बहुत बड़ी क्षति पहुंचाई। साथ ही डियागो गार्शिया, जो ब्रिटेन का सैनिक बेस रहा, जिसे पट्टे पर ब्रिटेन ने अमेरिका को दिया हुआ है, ईरान से 3800 किलोमीटर दूर तक मिसाइल गिराया, हालांकि बेस सही-सलामत बच गया था। कहां ट्रंप ने सोचा था, ईरान दो दिनों में अमेरिकी-इजरायली हमले के बाद और अयातुल्लाह खामनेई के साथ टॉप नेतृत्व को मारकर ईरान को नेतृत्वहीन समझ लिया था, लेकिन दुर्गा सप्तशती में वर्णित रक्तबीज की तरह नए-नए नेतृत्व सामने आने लगे और ईरान के ताबड़तोड़ हमले ने अमेरिका और इजरायल की कमर ही तोड़कर रख दी। सच तो यह है कि ट्रंप ने ईरान को कमजोर समझने की भूल कर दी। डियागो गार्शिया पर बैलेस्टिक मिसाइल दागकर ईरान ने दुनिया को अचंभित कर दिया। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के नाटो संगठन के राष्ट्रों ने ट्रंप की नीतियों की आलोचनाएं भी करनी शुरू कर दीं। ट्रंप झूठी शान के लिए दुनिया के नाटो राष्ट्रों से ही नहीं, चीन से समर्थन और सहायता मांगने को मजबूर दिखे। फिर ईरान को हॉर्मूज जलडमरूमध्य पर रोक हटाने की धमकी देते हुए सोशल मीडिया पर पोस्ट किया कि अमेरिका ने ईरान को नक्शे से मिटा दिया है, ईरान का नेतृत्व खत्म हो चुका है, उसकी नौसेना और वायुसेना नष्ट हो चुकी है, उसके पास अब कोई रक्षा तंत्र नहीं बचा है। ईरान को चेतावनी जारी कर संकेत दिया कि संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। ऐसे व्यक्ति का कोई कैसे विश्वास करे, जो एक घंटे के भीतर ही यू-टर्न ले ले और लिखा, अगर ईरान 48 घंटे में हॉर्मूज स्ट्रेट को पूरी तरह नहीं खोलेगा, तो संयुक्त राज्य अमेरिका उनके विभिन्न ऊर्जा संयंत्रों पर हमला कर उन्हें नष्ट कर देगा। ट्रंप गिरगिट की तरह रंग बदलने के लिए कुख्यात हो चुके हैं। एक बार पहले कहा था, युद्ध चार सप्ताह या उससे कम समय का है, फिर उन्होंने दूसरा बयान जारी किया, जिसके अनुसार ईरान के विरुद्ध अनिश्चित काल के लिए जंग जारी रह सकती है। यह भी कहा था कि ईरान मिशन कंप्लीट हो गया, जबकि उनके रक्षा मंत्री का बयान रहा, जंग अभी तेज हो रही है। ट्रंप की ईरान को धमकी कि अमेरिका ईरान के विद्युत संयंत्रों को नष्ट कर देगा, कहना कितना अमानवीय है। पहले ही हमले में एक स्कूल पर हमला करके मासूम बच्चों की हत्या कर चुका है। आखिरकार उन मासूम बच्चों ने अमेरिका का क्या बिगाड़ा था। अब बिजली संयंत्र को नष्ट करके वे ईरानी जनता को ही कष्ट पहुंचाएंगे। ईरान ही नहीं, खाड़ी देशों के बिजली संयंत्रों को और पीने के पानी वाले संयंत्रों पर ईरान भी हमला कर जनजीवन त्रस्त कर सकता है। वैसे हॉर्मूज स्ट्रेट पर पाबंदी लगाकर, बारूदी सुरंगें बिछाकर, ईरान ने तेल वाहक जहाजों से जुर्माना वसूली की धमकी देकर समूचे विश्व में ऊर्जा संकट खड़ा कर आर्थिक और ऊर्जा क्षति पहुंचाई है। अर्थव्यवस्था चौपट होने लगी है। रसोई गैस और तेल आपूर्ति ठप कर ईरान मानवता का गला घोंट रहा है। माना कि हॉर्मूज स्ट्रेट का 60 प्रतिशत हिस्से पर ईरान का कब्जा है, लेकिन दुनिया भर के देशों के निवासियों ने ईरान का क्या किया है, जो इतना बड़ा अमानवीय संकट खड़ा कर दिया है। ईरान मृत अयातुल्लाह खामनेई को धर्मगुरु मानता है, तो क्या इस्लाम यही कहता है कि समूची कायनात को पीड़ा पहुंचाओ। ऐसे ही निर्दय निर्णय से इस्लाम बदनाम होता है। अरे भाई, माना कि खाड़ी के कई देश अमेरिकी सुरक्षा में रहते आए हैं, लेकिन उन्हें संकट में डालकर अमेरिका भाग खड़ा हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात से शिया-सुन्नी का झगड़ा हो सकता है, लेकिन अन्य राष्ट्रों में ऊर्जा संकट पैदा कर तुम तो शैतान का काम करने लगे। सच कहा जाए, तो इजरायल का मुसलमानों से शत्रुता और इजरायल के सपोर्ट में अमेरिका का खड़ा होकर ईरान पर हमला भी तो अमानवीय है। ऊर्जा संकट खड़ा करने में अमेरिका, इजरायल के साथ ही ईरान भी जिम्मेदार है। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान हो ही नहीं सकता, तो फिर जो समस्या बातचीत से सुलझ सकती थी, उसे लेकर युद्ध में क्यों धकेला जाए। जवाब तीनों राष्ट्रों को देना होगा। शुक्र है, ट्रंप ने पांच दिनों तक ईरान के बिजली संयंत्रों पर हमले को टाल देने की बात कही है, लेकिन पांच दिनों बाद क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। हां, इजरायल-ईरान युद्ध में डर्टी बम के इस्तेमाल की चर्चा खूब हो रही है। कहा जा रहा है कि क्या ईरान इजरायल पर डर्टी बम छोड़ेगा। डर्टी बम अत्यंत घातक होता है, इससे विकिरण निकलती है, यानी रेडियोधर्मी तरंगें, जो मानव जीवन के लिए बेहद हानिकारक हैं। अगर डर्टी बम का उपयोग किया गया, तो मानव तबाही होगी। लेकिन सवाल फिर वहीं का वहीं खड़ा है, क्या युद्ध बंद होगा, क्या इजरायल, ईरान और अमेरिका कोई पहल करेगा। वैसे कतर जैसे अमेरिकी मोहरे बीच-बचाव की बातें कर रहे हैं, क्योंकि युद्ध बंद होना उनके हित में है, अन्यथा अमेरिकी पिछलग्गू राष्ट्रों पर ईरान फिर से हमले कर सकता है। एलपीजी गैस का 80% खाड़ी देशों से ही मिलता है, जिसका असर भारत पर ऊर्जा संकट के रूप में उपस्थित हुआ है। वहीं, अगर ईरान डियागो गार्शिया जैसे हिंद महासागर स्थित बेस पर सटीक हमला करता है, तो भारत के बेहद नजदीक होगा, जहां के अमेरिकी बेस से अमेरिका द्वारा भारत-चीन युद्ध में सहायता पाने की आशा भारत करता है, लेकिन सच तो यह है, अमेरिका चीन के साथ युद्ध का जोखिम नहीं ले सकता, इसलिए भारत को अपनी सुरक्षा की व्यवस्था स्वयं करनी पड़ेगी। सवाल है, क्या भारत इतनी तैयारी कर रहा है। आजकल ड्रोन युद्ध में कारगर भूमिका में हैं, महंगे डिफेंस सिस्टम को तबाह करने में सक्षम हैं, तो भारत को पांचवीं, नहीं छठी पीढ़ी के स्टील्थ विमान की तैयारी करनी होगी। ऑपरेशन सिंदूर की कमी से सीख लेनी पड़ेगी। वैसे बड़बोला पाकिस्तान अमेरिकी हमले के समय भारत पर हमले की योजना बना चुका है। युद्ध रुकवाने के लिए ट्रंप, नेतन्याहू और ईरान के नए सरदार के बीच मैराथन बैठके करनी होंगी। भारत अगर इजरायल और अमेरिका की आलोचना करता, तो कहा जा सकता है कि वह युद्ध रुकवाने में सहयोग कर सकता है। अब देखना मजेदार होगा कि युद्ध शीघ्र समाप्त होता है या नहीं। भारत अपनी कूटनीति का प्रयोग कर सकता है, लेकिन इसके लिए भारत को पुनः शांति प्रयासों में आगे बढ़ना होगा।




