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₹160.55 करोड़ के बैंक लोन फ्रॉड में ED का बड़ा एक्शन, मुंबई-वडोदरा में सात ठिकानों पर छापेमारी

₹12.20 करोड़ के गहने और ₹43.90 लाख नकद जब्त, तीन बैंक लॉकर और दो खाते फ्रीज

मुंबई। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बिलपावर लिमिटेड से जुड़े कथित ₹160.55 करोड़ के बैंक लोन फ्रॉड और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बड़ी कार्रवाई करते हुए मुंबई और वडोदरा में सात रिहायशी एवं व्यावसायिक ठिकानों की तलाशी ली। केंद्रीय एजेंसी के मुताबिक, यह कार्रवाई मंगलवार को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत कंपनी के प्रमोटरों और उनसे जुड़ी सहयोगी कंपनियों के परिसरों पर की गई। तलाशी के दौरान ED ने करीब ₹43.90 लाख नकद और लगभग ₹12.20 करोड़ मूल्य के आभूषण जब्त किए। इसके अलावा प्रमोटरों और संबंधित कंपनियों के तीन बैंक लॉकर तथा दो बैंक खाते फ्रीज किए गए हैं। इन खातों में करीब ₹27 लाख जमा बताए गए हैं। एजेंसी ने अचल संपत्तियों, जमीन और मशीनरी से जुड़े दस्तावेज, अकाउंट बुक्स, लेजर, डिजिटल उपकरण तथा जांच से संबंधित अन्य दस्तावेज भी बरामद किए हैं। ED की यह जांच दिल्ली में CBI की इकोनॉमिक ऑफेंस-I यूनिट द्वारा भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की शिकायत पर दर्ज FIR पर आधारित है। CBI ने 30 सितंबर 2024 को बिलपावर लिमिटेड, उसके निदेशकों और सहयोगी कंपनियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। आरोप है कि कंपनी ने बैंक से प्राप्त ऋण राशि का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल किया और खातों में हेरफेर किया, जिससे बैंक को ₹160.55 करोड़ का नुकसान हुआ। ट्रांसफॉर्मर लैमिनेशन और कोर बनाने वाली बिलपावर लिमिटेड का प्रबंधन राजेंद्र कुमार चौधरी, सुरेश कुमार चौधरी और नरेश कुमार चौधरी करते थे। कंपनी का SBI के साथ वर्ष 2005 से बैंकिंग संबंध था और उसे कैश क्रेडिट, वर्किंग कैपिटल, टर्म लोन के साथ बैंक गारंटी तथा लेटर ऑफ क्रेडिट जैसी सुविधाएं उपलब्ध थीं। कंपनी के ऋण खाते को 18 अप्रैल 2012 को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित कर दिया गया था। उस समय मूल बकाया राशि ₹160.55 करोड़ बताई गई थी। ED की जांच में आरोप है कि बिलपावर ने कथित शेल और फर्जी कंपनियों के माध्यम से ऐसे लेन-देन किए, जिनका इस्तेमाल बैंक से मिले धन को दूसरी जगह भेजने और राउंड-ट्रिपिंग के लिए किया गया। एजेंसी के मुताबिक, कथित जाली दस्तावेजों को वास्तविक बताकर पेश किया गया और उनके आधार पर विभिन्न कंपनियों के पक्ष में लेटर ऑफ क्रेडिट जारी कराए गए। इसके बाद रकम को कथित तौर पर उन कंपनियों में स्थानांतरित किया गया, जिन पर चौधरी परिवार के सदस्यों या उनके सहयोगियों का नियंत्रण था। कंपनी की वित्तीय स्थिति बिगड़ने के बाद दिवालियापन की प्रक्रिया भी शुरू हुई थी। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), मुंबई ने वर्ष 2021 में SBI की दिवालियापन याचिका स्वीकार की, जिसके बाद कॉर्पोरेट दिवालियापन समाधान प्रक्रिया शुरू हुई और बाद में कंपनी लिक्विडेशन में चली गई। कंपनी तथा उसकी विभिन्न संपत्तियों को बेचने के लिए कई बार ई-नीलामी के प्रयास भी किए गए हैं। फिलहाल कंपनी की लिक्विडेशन प्रक्रिया के साथ ही बैंक फंड के कथित डायवर्जन और मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर ED की जांच जारी है।

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