
डॉ. राघवेंद्र शर्मा
भारतीय वाङ्मय में काल के प्रवाह को केवल अंकों या गणनाओं में नहीं बाँधा गया है, बल्कि इसे एक जीवंत इकाई माना गया है, जहाँ प्रत्येक तिथि अपने भीतर एक विशिष्ट ऊर्जा और आध्यात्मिक संदेश समेटे होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, जिसे संपूर्ण भारत बड़े श्रद्धाभाव से ‘अक्षय तृतीया’ या ‘आखातीज’ के रूप में मनाता है, इसी जीवंत परंपरा का चरमोत्कर्ष है। ‘अक्षय’ शब्द अपने आप में पूर्णता का बोध कराता है,वह जिसका कभी क्षय न हो, जो समय की सीमाओं से परे सदा बना रहे। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक विरासत, कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था, सामाजिक उत्तरदायित्व और आधुनिक प्रशासनिक सुधारों का एक अद्भुत संगम है, जो हमें विनाशशील भौतिकता से ऊपर उठकर अविनाशी सत्कर्मों की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश की सरकार अक्षय तृतीया को ‘सामाजिक सशक्तिकरण’ के एक नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर रही है। वर्ष 2026 की अक्षय तृतीया पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सामूहिक विवाह और जनकल्याणकारी योजनाओं का समन्वय किया जा रहा है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह और निकाह योजना के माध्यम से न केवल बेटियों के हाथ पीले किए जा रहे हैं, बल्कि सहायता राशि का सीधा हस्तांतरण और घरेलू सामग्री का वितरण उन्हें एक सुरक्षित और सुदृढ़ भविष्य की नींव प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही, बाल विवाह के विरुद्ध ‘शून्य सहनशीलता’ की नीति अपनाकर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी सूरत में मासूमों का भविष्य दांव पर नहीं लगने दिया जाएगा। इस दिन को लाड़ली लक्ष्मी और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं से जोड़कर महिलाओं के स्वावलंबन और उच्च शिक्षा के संकल्प के साथ मनाया जा रहा है। अक्षय तृतीया की महत्ता को समझने के लिए इसके पौराणिक और आध्यात्मिक धरातल को देखना आवश्यक है, जहाँ यह तिथि सत युग और त्रेता युग जैसे महान कालखंडों के आरंभ बिंदु के रूप में प्रतिष्ठित है। यह वह पावन दिन है जब भगवान विष्णु ने अपने छठे अवतार परशुराम के रूप में पृथ्वी पर अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लिया था। इसी दिन पतित-पावनी गंगा का स्वर्ग से धरा पर आगमन हुआ, जिससे मानवता को शुचिता और जीवन का आधार प्राप्त हुआ। माता अन्नपूर्णा का प्राकट्य भी इसी तिथि को माना जाता है, जो हमें यह स्मरण कराता है कि संसार का पोषण केवल अन्न से नहीं, बल्कि सेवा और करुणा के भाव से होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन स्वयं के भीतर के उस प्रकाश को जगाने का है जो कभी मंद नहीं पड़ता। शास्त्रों की मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप और तप ‘अक्षय’ हो जाता है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि संसार में केवल वही संपदा हमारे साथ रहती है जिसे हमने निस्वार्थ भाव से दूसरों को अर्पित कर दिया है। भौतिक वस्तुएं समय के साथ लुप्त हो सकती हैं, लेकिन आत्मा के गुणों का संचय कभी समाप्त नहीं होता, यही इस पर्व का मूल आध्यात्मिक सार है। भारतीय समाज में अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ की संज्ञा दी गई है, जो इसे ज्योतिषीय गणनाओं से भी ऊपर एक सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में स्थापित करती है। इस दिन किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि सूर्य और चंद्रमा की स्थिति इस समय अपनी उच्चतम ऊर्जा में होती है। इसी सुलभता के कारण यह दिन सामूहिक विवाहों के लिए एक बड़े सामाजिक मंच के रूप में उभरा है। सामूहिक विवाह की यह परंपरा केवल आर्थिक सुलभता का साधन नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज में बढ़ती फिजूलखर्ची और दिखावे की संस्कृति पर एक करारा प्रहार है। जब एक ही मंडप के नीचे विभिन्न आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के परिवार साथ आते हैं, तो जातिगत भेदभाव की दीवारें ढहने लगती हैं और एक समरस समाज की नींव पड़ती है। यह आयोजन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए गरिमापूर्ण जीवन की शुरुआत का माध्यम बनते हैं, जहाँ आडंबर के स्थान पर आशीष और सद्भाव को प्राथमिकता दी जाती है। हालाँकि, इस पावन तिथि के साथ ‘अबूझ मुहूर्त’ की आड़ में बाल विवाह जैसी कुरीति का काला साया भी जुड़ा रहा है, जो समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। बाल विवाह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह एक बच्चे के सुनहरे भविष्य, उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ किया जाने वाला घोर अपराध है। कम उम्र में विवाह के कारण विशेषकर बालिकाओं को शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, जिससे वे आर्थिक रूप से परावलंबी रह जाती हैं। साथ ही, अपरिपक्व अवस्था में स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं उनके जीवन को संकट में डाल देती हैं। आज का सजग समाज और सरकारें इस कुप्रथा को जड़ से मिटाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। ‘लाडो अभियान’ जैसे प्रयासों और प्रशासनिक निगरानी ने ग्रामीण अंचलों में एक नई चेतना का संचार किया है। अब यह सामूहिक उत्तरदायित्व बन गया है कि समाज का प्रत्येक घटक चाहे वह धर्मगुरु हो, पंडित हो या सेवा प्रदाता,बाल विवाह के विरुद्ध एक दीवार बनकर खड़ा हो। अक्षय तृतीया का वास्तविक उत्सव तभी सफल है जब प्रत्येक बच्चा अपनी शिक्षा और विकास का पूर्ण अवसर प्राप्त कर सके। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश की सरकार ने अक्षय तृतीया को ‘सामाजिक सशक्तिकरण’ के एक नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है। वर्ष 2026 की अक्षय तृतीया पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश जिस तरह से सामूहिक विवाह और जनकल्याणकारी योजनाओं का समन्वय कर रहा है, वह अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह और निकाह योजना के माध्यम से न केवल बेटियों के हाथ पीले किए जा रहे हैं, बल्कि सहायता राशि का सीधा हस्तांतरण और घरेलू सामग्री का वितरण उन्हें एक सुरक्षित और सुदृढ़ भविष्य की नींव प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही, बाल विवाह के विरुद्ध ‘शून्य सहनशीलता’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाकर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी सूरत में मासूमों का भविष्य दांव पर नहीं लगने दिया जाएगा। प्रशासन की सतर्कता और उड़न दस्तों की सक्रियता इस महापर्व की पवित्रता को बनाए रखने के लिए ढाल का काम कर रही है। यह सरकार की दूरदर्शिता ही है कि इस दिन को लाड़ली लक्ष्मी और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं से जोड़कर महिलाओं के स्वावलंबन और उच्च शिक्षा के संकल्प के साथ मनाया जा रहा है। अक्षय तृतीया का एक और महत्वपूर्ण पहलू कृषि संस्कृति से जुड़ा है। किसान इस दिन को नई फसल और नई उम्मीदों के प्रारंभ के रूप में देखते हैं। कृषि महोत्सवों के माध्यम से जैविक खेती और उन्नत बीजों का वितरण इस बात का प्रतीक है कि हमारी प्रगति की जड़ें आज भी मिट्टी से जुड़ी हैं। ‘अक्षय कृषि’ का विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखने का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जब हम अपनी परंपराओं को आधुनिक विज्ञान और सरकारी योजनाओं के साथ जोड़ देते हैं, तो अक्षय तृतीया जैसा पर्व केवल एक दिन का उत्सव न रहकर समाज के सर्वांगीण विकास का इंजन बन जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि समृद्धि केवल स्वर्ण के क्रय में नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति हमारी संवेदनशीलता में निहित है। इस दृष्टि से देखा जाए तो अक्षय तृतीया भारतीय मेधा और संस्कृति का वह आलोक है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। यह पर्व हमें यह विश्वास दिलाता है कि यदि हमारे कर्म सत्य और सेवा पर आधारित हैं, तो उनका प्रभाव शाश्वत रहेगा। सामूहिक विवाहों के माध्यम से बढ़ती सामाजिक एकता, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध प्रखर होती जन-चेतना और सरकारों द्वारा किए जा रहे सशक्तिकरण के प्रयास इस बात के प्रमाण हैं कि हम एक बेहतर समाज की ओर बढ़ रहे हैं। अक्षय तृतीया का यह महापर्व हमें संकल्प लेने के लिए प्रेरित करता है कि हम न केवल अपनी सुख-सुविधाओं का संचय करें, बल्कि ज्ञान, संस्कार और परोपकार की ऐसी पूंजी जमा करें जिसका कभी क्षय न हो। जब प्रत्येक व्यक्ति इस बोध के साथ जीवन व्यतीत करेगा, तभी अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश सार्थक होगा और हमारा राष्ट्र पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन होकर पूरे विश्व को शांति और शुभता का मार्ग दिखाएगा। सत्कर्मों की यह निरंतरता ही अक्षय तृतीया की सच्ची उपलब्धि है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी।




