
सत्ता और पौरुष बल ने हमेशा ही नारियों को कमजोर समझकर ‘भोग्या वस्तु’ माना है। मर्द की इसी मानसिकता से क्लांत होकर कवयित्री को लिखना पड़ा— ‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध और आंखों में पानी’। यहां तक कि अंबेडकर के नाम पर यह भी प्रचारित किया गया कि उन्होंने महिलाओं को राजनीति में लाने का विरोध करते हुए कहा था कि महिलाएं घर-आंगन बुहारने, भोजन बनाने, बर्तन-कपड़े साफ करने और बच्चा जनने के लिए हैं, उन्हें आंगन से बाहर नहीं निकलना चाहिए। सहस्त्राब्दियों से नारियां सत्ता द्वारा छली जाती रही हैं। सती सावित्री को यमराज ने, अहिल्या को इंद्रदेव ने और सीता को त्रैलोक्य विजयी रावण ने छला। आज भी सत्ता में बैठे ‘भूखे भेड़ियों’ द्वारा महिलाओं का शील-हरण किया जा रहा है।
मोदी सरकार ने ‘नारी सशक्तिकरण’ का नारा वर्षों से बुलंद किया है, लेकिन पिछले बारह वर्षों में लाखों महिलाएं और नाबालिग बच्चियां गायब हुईं। दर्जनों पत्नियों द्वारा प्रेमियों के साथ मिलकर हत्याएं कराई गईं। सत्ताधारी दल के विधायकों और पदाधिकारियों के विरुद्ध बलात्कार के आरोप लगे। ‘गेरुआ वस्त्र’ और ‘आध्यात्म’ की आड़ में पाखंडी बाबाओं द्वारा नारियां प्रताड़ित हुईं। यहां तक कि शिक्षण संस्थानों में भी छात्र-छात्राओं के साथ दुष्कर्म की खबरें अनवरत आती रहती हैं। बाबाओं द्वारा महिलाओं की खरीद-फरोख्त के वीडियो सामने आते हैं और शिष्याओं के बलात्कार के दोषी जेल भेजे जाते रहे हैं, जिन्हें बचाने का प्रयास अक्सर सत्ता द्वारा ही किया जाता है। मानसिकता इतनी गिर चुकी है कि एक महिला जिलाध्यक्ष ने अपनी ही 14 साल की बच्ची का सामूहिक बलात्कार कराया। बल और पद के मद में चूर मर्द कब दरिंदा बन जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।
प्रधानमंत्री के ‘राष्ट्र के नाम संबोधन’ में महिला चिंता से अधिक चुनावी चिंता की झलक मिली। संसद में महिला आरक्षण के साथ-साथ सीटों की संख्या बढ़ाने के बिल पेश किए गए। जब 543 सांसद पहले से ही जनता पर बोझ हैं, तो उन्हें 850 करने के प्रस्ताव की क्या आवश्यकता थी? विपक्ष पर दोष मढ़ना महिलाओं में भ्रम पैदा करने की कोशिश प्रतीत होती है, ताकि विपक्षी दलों को ‘महिला विरोधी’ सिद्ध करके वोट हासिल किए जा सकें। दरअसल, महिला आरक्षण की नींव पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने 1989 में 64वें और 65वें संशोधन बिल के जरिए रखी थी, जिसे 1993 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन द्वारा कानूनी रूप दिया गया। इससे जमीनी स्तर पर (पंचायतों और नगर पालिकाओं में) 33 प्रतिशत आरक्षण लागू हुआ। तत्कालीन समय में आज की सत्ता में बैठे दलों ने राज्यसभा में बहुमत न होने के कारण इसे अटका दिया था। मनमोहन सिंह सरकार ने 9 मार्च 2010 को 108वां संविधान संशोधन लाकर लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का मार्ग प्रशस्त किया था। फिर मोदी सरकार द्वारा 2029 के लाभ के लिए 2026 में विधेयक लाने का क्या औचित्य था? विशेषकर तब, जब 2023 में ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किया जा चुका था। 16 अप्रैल 2026 को फिर से बिल पेश करना चुनावी रणनीति का हिस्सा लगता है। सरकार जानती थी कि उसके पास दो-तिहाई बहुमत नहीं है, फिर भी बिल लाया गया ताकि विपक्ष द्वारा रोके जाने पर उन्हें ‘महिला विरोधी’ करार दिया जा सके। चुनाव आयोग द्वारा आचार संहिता लागू होने के बाद विशेष सत्र बुलाना मर्यादाओं का उल्लंघन है।
सच तो यह है कि बीजेपी शासित राज्यों में महिलाओं के साथ दरिंदगी की घटनाएं रुक नहीं रही हैं। ‘डबल इंजन’ की सरकारें इन्हें रोकने में विफल रही हैं, इसलिए सहानुभूति हासिल करने के लिए ऐसे बिल लाए जा रहे हैं। विपक्ष नारी विरोधी नहीं है, बल्कि वह बीजेपी की अवसरवादिता का विरोधी है। बहुमत के घमंड में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को पलटना और विपक्षी सांसदों को निलंबित करके कानून पारित कराना लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है।




