मुंबई। मुंबई में आयोजित ‘टेक वारी 2.0’ कार्यक्रम के अंतर्गत हुए ‘कलारंग: आर्ट, एआई एंड गवर्नेंस’ परिसंवाद में कला, फिल्म और शिल्पकला से जुड़े विशेषज्ञों ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) एक उपयोगी तकनीकी साधन जरूर है, लेकिन यह कभी भी मानवीय भावनाओं, संवेदनाओं और रचनात्मकता का स्थान नहीं ले सकती। वक्ताओं ने एआई के बढ़ते प्रभाव पर चर्चा करते हुए तकनीक के संतुलित और जिम्मेदार उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से मंत्रालय स्थित त्रिमूर्ति प्रांगण में आयोजित इस विशेष परिसंवाद में बृंदा मिलर, अरज़ान खंबाटा, रोहन सिप्पी और अशोक कौल ने भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय की निदेशक निधि चौधरी ने किया। इस अवसर पर सामान्य प्रशासन विभाग की अपर मुख्य सचिव वी. राधा भी उपस्थित थीं। काला घोड़ा फेस्टिवल की संस्थापक बृंदा मिलर ने कहा कि पिछले 27 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहे इस फेस्टिवल की सफलता का मुख्य कारण उसकी निरंतरता और शासन का सहयोग है। उन्होंने कहा कि यदि किसी निजी सांस्कृतिक आयोजन को सरकार का सहयोग मिले तो उसका प्रभाव और व्यापक हो जाता है। वरिष्ठ फिल्म निर्देशक अशोक कौल ने फिल्म जगत में तकनीक के बदलते स्वरूप पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि फिल्में केवल तकनीक नहीं बल्कि मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति होती हैं। यदि किसी फिल्म में संवेदनाएं और भावनात्मक जुड़ाव नहीं होगा तो वह दर्शकों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पाएगी। उन्होंने कहा कि आज समय बचाने के लिए तकनीकी शॉर्टकट अपनाए जा रहे हैं, लेकिन फिल्में कई कलाओं का संगम हैं और उनमें मानवीय स्पर्श बना रहना जरूरी है। फिल्म निर्देशक रोहन सिप्पी ने एआई को फिल्म उद्योग के सामने उभरती नई चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि समय के साथ फिल्म जगत में कई बदलाव आए हैं और एआई भी उसी प्रक्रिया का हिस्सा है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि तकनीक कितनी भी विकसित हो जाए, मानवीय कौशल और रचनात्मकता का महत्व हमेशा बना रहेगा। उन्होंने मुंबई को देश की फिल्म राजधानी के रूप में और अधिक मजबूत बनाने के लिए कौशल विकास और रोजगार सृजन पर जोर दिया।शिल्पकार अरज़ान खंबाटा ने सार्वजनिक कला के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पब्लिक आर्ट समाज को कला से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा कि धातु, पत्थर और कांच से बनी भव्य कलाकृतियां समाज की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि शिल्पकला में एआई का उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन किसी भी कालजयी कला के निर्माण के लिए कलाकार की दृष्टि और संवेदनशीलता सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। परिसंवाद में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि एआई का उपयोग सावधानीपूर्वक और सीमित रूप में किया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कला और फिल्म पूरी तरह एआई पर निर्भर हो गए तो उनकी मौलिकता और मानवीय पहचान को खतरा पैदा हो सकता है। कार्यक्रम के दौरान निदेशक निधि चौधरी ने एआई के कारण बदलती सृजनात्मक और प्रशासनिक प्रणालियों, सामाजिक कथानकों और दर्शकों के अनुभव पर इसके प्रभाव को लेकर विशेषज्ञों से चर्चा की। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित दर्शकों ने भी विशेषज्ञों से सवाल पूछकर संवाद किया।