Sunday, March 22, 2026
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दृष्टिकोण: राष्ट्र सर्वोपरि या धार्मिक और जातीय पहचान

डॉ.सुधाकर आशावादी
लगता है कि भारत को षड्यंत्रकारी शक्तियों की बुरी नजर लग गई है। सबका साथ सबका विकास की बात करने वाले दिशानायक विघटनकारी नीतियों को लागू करके आम आदमी को जातियों में विभाजित करने जैसा कृत्य कर रहे हैं। जिस पर सत्य सनातन की रक्षा करने का दायित्व है, वह अपने पद के अहम् में स्वयं को आम आदमी समझने के लिए तैयार नहीं है। सियासी तत्व की तरह व्यवस्था एवं व्यवस्थापकों के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप कर रहा है। उसके समर्थन में वे राजनीतिक दल भी आवाज उठाने में पीछे नहीं हैं, जिन्होंने कभी उनकी सनातन परम्पराओं को मान्यता नहीं दी, बल्कि अतीत में उनके साथ दुर्व्यवहार किया। कहीं किसी दल का कोई पदाधिकारी किसी खास जाति के नेताओं के साथ बैठने पर आपत्ति व्यक्त करता है। कहीं किसी विभेदकारी प्रावधान पर वे लोग चुप्पी साधने पर विवश हो जाते हैं, जिनसे निष्पक्ष चिंतन की अपेक्षा रहती है। कहीं समाज को बांटने वाली विभेदकारी नीतियों के समर्थन में ऐसे तत्वों की भीड़ जमा हो जाती है, जो कभी अपने वैचारिक मूल्यों का निर्माण नहीं कर सकते। जिनका मानसिक स्तर इतना श्रेष्ठ नहीं रहा, कि वे अपना भला बुरा समझ सकें। आजादी के उपरांत से उन्हें आगे बढ़ने के अनेक अवसर मिले, किन्तु वे अपने पैरों पर खड़े होने में भी समर्थ नहीं हो सके। स्थिति विकट है, जातिगत पूर्वाग्रह उनकी हीनता को समाप्त करने में समर्थ नहीं हैं, तिस पर अंध भीड़ को भ्रमित करने में ऐसे तत्व सक्रिय हैं, जिन्हें किसी भी तर्क से कोई सरोकार नहीं है। सच उन्हें स्वीकार्य नहीं है। विडंबना यह है, कि समाज में अलगाव उत्पन्न करने वाली प्रयोगशाला में आदमी आदमी के बीच वैमनस्यता उत्पन्न करने के लिए नए नए परीक्षण किए जा रहे हैं। कहीं किसी राजनीतिक दल में किसी दिशानायक की बढ़ती लोकप्रियता से उसी दल के अन्य लोग अपना कद ऊँचा करने के लिए औरों का कद घटाने में जुटे हैं। कहने का आशय यह है, कि कोई भी अपने आप में संतुष्ट नहीं है। अपने अपने स्वार्थ सर्वोपरि हैं। देश कहीं पीछे छूट रहा है। ऐसे में हम अपनी भौतिक समृद्धि पर किस प्रकार गर्व का अनुभव करें,यह विचारणीय बिंदु हैं। कभी धार्मिक उन्माद और कभी जातीय भेदभाव से समाज में विघटन के बीज बोने जैसा कार्य देश को कहाँ ले जा रहा है ? यह आज चिंतन का विषय ही नहीं रहा। शिक्षा संस्थानों में भारतीय होने की पहचान के स्थान पर जातीय पहचान स्थापित रखने के लिए प्रवेश प्रपत्रों में जातीय कॉलम क्या यह सिद्ध नहीं करते कि जातीय भेदभाव का प्रदर्शन जातीय कॉलम के माध्यम से ही होता है। ऐसे में मुख्य प्रश्न यही है, कि व्यक्ति के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है या उसकी धार्मिक और जातीय पहचान?

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