Sunday, March 15, 2026
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बॉम्बे हाईकोर्ट का अहम फैसला: पिता के निधन के बाद नाबालिग की प्राकृतिक अभिभावक माँ, दादा-दादी से लेकर माँ को सौंपी गई कस्टडी

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण पारिवारिक विवाद में फैसला सुनाते हुए कहा कि पिता के निधन के बाद नाबालिग बच्चे की प्राकृतिक अभिभावक उसकी माँ होती है, जब तक यह साबित न हो जाए कि वह बच्चे के कल्याण की उपेक्षा कर रही है या अक्षम है। अदालत ने पाँच साल की बच्ची की कस्टडी उसकी माँ को सौंपते हुए दादा-दादी के साथ रहने के आदेश को पलट दिया। न्यायमूर्ति एस.जी.चपलगांवकर की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू अल्पसंख्यक एवं संरक्षकता अधिनियम के तहत बच्चे का प्राकृतिक अभिभावक पहले पिता और फिर माँ होती है, और माँ को अधिकार से वंचित करना तभी संभव है जब यह साबित हो कि बच्चे के हितों को खतरा है।
मामला क्या था?
मामले में याचिकाकर्ता महिला की शादी 2018 में हुई थी और 2024 में आपसी सहमति से उसका तलाक हो गया था। तलाक के समय एक वर्षीय बच्ची की कस्टडी पति और उसके माता-पिता को दी गई थी, क्योंकि महिला की कोई आय नहीं थी और वह अपने माता-पिता पर आश्रित थी। लेकिन जनवरी 2025 में पति के निधन के बाद, बच्ची के दादा-दादी ने उसकी अभिभावकता के लिए अदालत में आवेदन किया। माँ ने इसका विरोध किया और उच्च न्यायालय का रुख करते हुए कहा कि अब वह आर्थिक रूप से सक्षम है और बच्ची की बेहतर देखभाल कर सकती है। उसने यह भी तर्क दिया कि दादा-दादी उम्रदराज़ हैं और बच्चे की शारीरिक-मानसिक देखभाल के योग्य नहीं हैं।
जिला अदालत का फैसला पलटा
इससे पहले जिला अदालत ने अप्रैल में माँ के आवेदन को खारिज कर दिया था और कस्टडी दादा-दादी के पास ही रहने दी थी। हाईकोर्ट ने इस निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि “एक लगभग पाँच साल की बच्ची के लिए माँ की देखभाल और स्नेह का कोई विकल्प नहीं है।’’ अदालत ने यह भी माना कि तलाक के समय माँ द्वारा कस्टडी छोड़ना त्याग का मामला नहीं था, बल्कि वह समय की परिस्थिति के कारण था।
दादा-दादी को भी अधिकार
फैसले में अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दादा-दादी को सप्ताहांत और छुट्टियों में बच्ची से मिलने की अनुमति होगी, ताकि उसके सामाजिक और पारिवारिक संबंध प्रभावित न हों। यह निर्णय न केवल माँ की अभिभावकता को लेकर कानूनी स्पष्टता देता है, बल्कि ‘बच्चे के सर्वोत्तम हित’ की अवधारणा को प्राथमिकता देता है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि आर्थिक सशक्तिकरण के बाद माँ की भूमिका को कानूनी रूप से मान्यता दी जाती है, भले ही पहले उसने बच्चा न पालने का निर्णय लिया हो।

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