
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) की पूर्व पार्षद विशाखा राउत को बड़ा झटका देते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी है। राउत ने जाति प्रमाणपत्र अमान्य घोषित होने के बाद उनकी पार्षद सीट खाली घोषित करने के मुंबई महानगरपालिका आयुक्त के फैसले को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि जाति प्रमाणपत्र अमान्य होने का असर चुनाव पर सीधे और पूर्वव्यापी रूप से पड़ता है। विशाखा राउत बीएमसी के ओबीसी महिलाओं के लिए आरक्षित वार्ड क्रमांक 191 से निर्वाचित हुई थीं। पालघर जिला जाति प्रमाणपत्र जांच समिति ने 20 अगस्त 2026 को उनके कुनबी जाति प्रमाणपत्र को अमान्य घोषित कर दिया था। इसके पांच दिन बाद महानगरपालिका आयुक्त ने उनकी सीट रिक्त घोषित कर दी और छह वर्ष तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित करने की सिफारिश की थी। राउत ने इस कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए दावा किया था कि महाराष्ट्र जाति प्रमाणपत्र कानून में हाल में किए गए संशोधन के तहत उन्हें संरक्षण मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि कानून की धारा 10(5) के तहत जाति प्रमाणपत्र के आधार पर मिले लाभ वापस लेने से पहले प्रमाणपत्र अमान्य करने के आदेश को चुनौती देने का अवसर दिया जाता है। हालांकि हाई कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि महाराष्ट्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विमुक्त जाति, घुमंतू जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और विशेष पिछड़ा वर्ग जाति प्रमाणपत्र कानून की धारा 10(4) के तहत अमान्य जाति प्रमाणपत्र के आधार पर जीता गया चुनाव पूर्वव्यापी प्रभाव से समाप्त माना जाता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 10(5) कानून के एक अलग पहलू से संबंधित है और इससे धारा 10(4) के तहत उत्पन्न होने वाले कानूनी परिणाम कम या समाप्त नहीं होते। अदालत के अनुसार, लाभ वापस लेने के संबंध में अपील की समय-सीमा और अतिरिक्त अवधि का प्रावधान होने का अर्थ यह नहीं है कि जाति प्रमाणपत्र अमान्य होने से चुनाव पर पड़ने वाला कानूनी प्रभाव रुक जाएगा। हाई कोर्ट ने यह भी माना कि महानगरपालिका आयुक्त ने मुंबई महानगरपालिका अधिनियम की धारा 16(1C) के तहत कानून के अनुरूप कार्रवाई की। राउत की अयोग्यता सीधे तौर पर उनके जाति प्रमाणपत्र के अमान्य घोषित होने के कारण उत्पन्न हुई थी। राउत की ओर से यह भी तर्क दिया गया था कि उनके खिलाफ धोखाधड़ी का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया गया है। अदालत ने इस दलील को भी खारिज करते हुए कहा कि एक बार जाति प्रमाणपत्र अमान्य घोषित हो जाने के बाद उससे जुड़े कानूनी परिणाम स्वतः लागू होते हैं और इसके लिए अलग से धोखाधड़ी साबित किया जाना आवश्यक नहीं है। याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां महानगरपालिका आयुक्त के आदेश को दी गई चुनौती तक ही सीमित हैं। कोंकण विभागीय आयुक्त के समक्ष राउत की लंबित अपील से जुड़े सभी महत्वपूर्ण मुद्दों को अदालत ने खुला रखा है। साथ ही राउत को अपनी लंबित अपील पर शीघ्र सुनवाई की मांग करने की स्वतंत्रता दी गई है।

