
विवेक रंजन श्रीवास्तव
ज्यादा नहीं 30 बरस पहले एक सिद्ध बाबा अपने भक्तों को एक आशीर्वाद दिया करते थे, “बच्चा तुम्हें जीवन में इतना मिले कि तुम बांटते-बांटते थक जाओ पर खत्म न हो।” तब दुनिया को बाबा जी का आशीर्वाद समझ नहीं आता था। दरअसल बाबा जी 30 बरस बाद की भाषा में कहा करते थे। अब जाकर समझ आया कि बाबा दरअसल व्हाट्सएप के इन पवित्र संदेशों की बात करते थे, जो हर सुबह हमारे मोबाइल पात्र में बिन मांगे भर जाते हैं। यह वह अक्षय पात्र है जिसमें चित्रमयी, टंकित ज्ञान और वीडियो सूचनाएं कभी खत्म ही नहीं होतीं। बांटने वाले थक जाते हैं। डिजिटल दुनिया के कूड़ेदान में हर पल यह “पावन” सुनामी चल रही होती है। यह संदेश ज्ञान आपके डेटा को खा जाती है, आपकी तर्कशक्ति का भी सरेआम कत्लेआम कर देती है। आज व्हाट्स अप एक ऐसा अद्भुत लोकतंत्र है जहाँ सूचना के नाम पर कुछ भी परोसा जा सकता है और लोग उसे प्रसाद समझकर लपक लेते हैं। आज सुबह व्हाट्सएप की कई गलियों में एक किडनी दान करने का संदेश फिर से अपनी लंगड़ी टांगों के साथ दौड़ रहा था, जो मेरे इनबॉक्स में कई समूहों में प्रगट हुआ। इस परमार्थ फॉरवर्ड से मुझे भरोसा हुआ कि दुनिया में अभी भी दया, धर्म, सहयोग वगैरह लुप्त नहीं हुए हैं। यह संदेश एक्सीडेंट में मृत डॉ. सुधीर के परिवार जनों समेत उनकी किडनी एवं अन्य अंगों के महान दान के सम्बन्ध में है। डॉ.सुधीर जी और उनकी पत्नी पिछले दस सालों से हर दूसरे महीने ब्रेन डेड घोषित हो रहे हैं और चार किडनियाँ उसी बाबा के आशीर्वाद की तरह खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही हैं। जिस समाज में लोग अपने पड़ोसी को चीनी की एक कटोरी देने से पहले दस बार सोचते हैं, वही समाज डिजिटल दुनिया में अंगदान के लिए इतना व्याकुल है कि बिना सोचे-समझे मैसेज फॉरवर्ड करने को ही सबसे बड़ी समाज सेवा मान बैठा है। फॉरवर्ड करने वालों का मनोविज्ञान भी किसी शोध का विषय होना चाहिए। इनका दिल इतना बड़ा है कि ये किसी भी अनजान व्यक्ति की मौत पर तुरंत एक “दुखी इमोजी” चिपका देते हैं और फिर उसी अंगूठे से उस झूठ को कापी पेस्ट कर हजार लोगों तक पहुँचा देते हैं। उनके लिए यह संदेश भेजना एक तरह का “डिजिटल मोक्ष” है। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने यह मैसेज फॉरवर्ड नहीं किया तो शायद ब्रह्मांड की धुरी घूमना बंद कर देगी या किसी मरीज की जान की जिम्मेदारी सीधे उनके ब्रॉडबैंड कनेक्शन पर आ जाएगी। मैसेज भेजने वाले सज्जन नीचे अपना नाम ऐसे शान से लिखते हैं जैसे उन्होंने खुद अपनी लैब में वे किडनियाँ तैयार की हों। विसंगति का आलम यह है कि संदेश में लिखे नंबर या तो स्विच ऑफ होते हैं या फिर वह बेचारा कोई ऐसा व्यक्ति होता है जिसे खुद नहीं पता कि उसकी प्रोफाइल फोटो के साथ लोग किडनी का यह परमार्थ कर रहे हैं। एक जमाना था जब चिट्ठियाँ आती थीं तो लोग उसमें लिखी बातों की गहराई नापते थे, अब तो जमाना क्विक ‘क्लिक’ का है। बस अंगुली चली और जिम्मेदारी खत्म। लोग पढ़ते भी नहीं कि तारीख क्या है, स्थान क्या है या क्या यह वैज्ञानिक रूप से संभव भी है। उन्हें बस उस प्रभावी लाइन से मतलब होता है कि “हो सकता है किसी की मदद हो जाए”। इस एक लाइन ने दुनिया के आधे बेवकूफों को “मसीहा” बनने का लाइसेंस दे रखा है। हैरानी की बात यह है कि जो लोग घर के रद्दी वाले से दस रुपये के लिए आधा घंटा बहस करते हैं, वे इंटरनेट पर बिना किसी वेरिफिकेशन के किसी भी फर्जी खबर पर अपना कीमती समय और डेटा लुटाने को तैयार रहते हैं। इनका मनोविज्ञान बड़ा ही मासूम मगर खतरनाक है। यह एक तरह का “इन्फो-डायरिया” है जहाँ सूचना पचती नहीं है, बस बाहर निकलने के लिए छटपटाती रहती है। फॉरवर्ड करने वाले की मानसिकता यह होती है कि मैं तो बस अच्छा काम कर रहा हूँ, अगर खबर झूठी भी निकली तो मेरा क्या जा रहा है। पर भाई साहब, आपका बहुत कुछ जा रहा है। आपकी साख जा रही है, आपकी समझदारी पर सवाल उठ रहे हैं और सबसे बड़ी बात, उस असली जरूरतमंद का हक मारा जा रहा है जो इस शोर के बीच कहीं खो गया है। चिकित्सा विज्ञान के नियम कायदे एक तरफ और हमारे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के नियम एक तरफ। डॉक्टर चिल्ला-चिल्ला कर थक गए कि अंग प्रत्यारोपण की एक कानूनी प्रक्रिया होती है, मैचिंग होती है, सख्त प्रोटोकॉल होते हैं, पर हमारे फॉरवर्ड वीर कह रहे हैं कि नहीं बस फोन लगाओ और किडनी ले जाओ जैसे किसी मॉल में सेल लगी हो। यह जो “परोपकार की खुजली” है, यह समाज को जागरूक बनाने के बजाय मानसिक रूप से पंगु बना रही है। लोग सोचते हैं कि ग्रुप में मैसेज डाल दिया तो गंगा नहा लिए। जमीन पर उतरकर किसी की मदद करने की हिम्मत नहीं है पर उंगलियों से क्रांति करने में हम सब अव्वल हैं। इस पूरे खेल में सबसे मजेदार किरदार वह होता है जो इन मैसेज के नीचे ‘आमीन’ या ‘सादर’ लिखता है। वह उस झूठ को और ज्यादा पवित्र बना देता है। जब कोई पढ़ा-लिखा सॉफ्टवेयर इंजीनियर या डॉक्टर भी इस बहती गंगा में हाथ धो लेता है, तब लगता है कि डिग्री और बुद्धि का आपस में कोई खास लेना-देना नहीं है। यह एक सामूहिक मूर्खता का उत्सव है जिसे हम हर त्यौहार की तरह पूरी श्रद्धा के साथ सुबह सबेरे मना कर अपने काम पर निकलते हैं। अगर वास्तव में मानवता बचानी है तो पहले उस विवेक को बचाइए जो इन संदेशों को पढ़कर सबसे पहले यह सवाल करे कि “क्या यह सच है?”। संवेदना का अर्थ यह नहीं है कि आप हर कूड़े को सोने की थाली में सजाकर दूसरों को परोसें। सच तो यह है कि फैक्ट चेक के अनुसार कथित सुधीर जी और उनकी पत्नी वाले संदेश को फैलते हुए भी बरसों हो चुके हैं, लेकिन उनकी किडनियों के नाम पर आज भी लाखों लोगों का दिमाग डेड किया जा रहा है। डिजिटल साक्षरता का मतलब सिर्फ ऐप चलाना नहीं है बल्कि यह समझना भी है कि हर चमकती चीज सोना नहीं होती और हर फॉरवर्ड किया हुआ मैसेज पुण्य नहीं होता। अगली बार जब कोई ऐसा संदेश आए तो रुकिए, सोचिए, बुद्धि को थोड़ा विश्राम दीजिए। मानवता तब ज्यादा सुखी होगी जब हम झूठ को फैलाने के बजाय उसे वहीं दफन करना सीख जाएंगे। वरना यह चार किडनियाँ और सुधीर जी का परिवार अगले पचास सालों तक इसी तरह व्हाट्सएप के आईसीयू में भर्ती रहेगा और हम सब इस मजाक के मूक गवाह बने रहेंगे। समझदारी इसी में है कि हम संदेश वाहक न बनकर सत्य के पहरेदार बनें। जिस दिन हम अपनी “बुद्धि का अंगदान” करने से मना कर देंगे, उसी दिन ऐसे फर्जी संदेशों की मौत हो जाएगी। फिलहाल तो आलम यही है कि दुनिया भर की किडनियाँ सलामत रहें या न रहें, लेकिन हमारा यह फॉरवर्ड करने का शौक अमर रहे। आखिर डिजिटल परोपकार का यह नशा ही तो हमें महान होने का भ्रम देता है और इस भ्रम को पालने के लिए सुधीर जी जैसे न जाने कितने काल्पनिक किरदार हर रोज शहीद किए जाते रहेंगे। अब तो ए आई के फेक वीडियो किरदार भी सोशल मीडिया में आ गए हैं, जिन्हें फांसी से बचाने राष्ट्रपति ट्रंप तक इस भ्रम जाल का शिकार होकर ईरान से बात करने को तैयार हैं,आम लोगों की क्या बिसात।




