
मुंबई। भारत एक ऐसा देश है जहाँ विभिन्न भाषाओं, जातियों और धर्मों के नागरिक रहते हैं। भाषा कोई भी हो, अगर फिल्म में मानवीय भावनाएं, स्वाभाविक और सुंदर अभिनय, और भारतीय संस्कृति की झलक हो, तो वह दर्शकों के दिलों को छूती है। भाषा और दर्शक चाहे कोई भी हों, ऐसी फिल्में वास्तव में भारतीय सिनेमा कहलाती हैं, ऐसा विचार दक्षिण भारतीय फिल्म कलाकारों ने व्यक्त किया। बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित जिओ वर्ल्ड सेंटर में आयोजित वैश्विक दृश्य-श्रव्य मनोरंजन शिखर सम्मेलन (WAVES 2025) के दूसरे दिन “पैन-इंडियन सिनेमा: मिथ या गति?” विषय पर एक चर्चा आयोजित की गई। इस चर्चा में वरिष्ठ अभिनेता अनुपम खेर, दक्षिण भारतीय अभिनेता नागार्जुन, कार्थी, और अभिनेत्री खुशबू सुंदर शामिल हुए। संचालन नमन रामचंद्रन ने किया। चर्चा में यह विचार सामने आया कि केवल हिंदी कलाकारों को लेकर या फिल्म को डब करके पैन-इंडिया फिल्म नहीं बनती। कहानी ऐसी होनी चाहिए जो पूरे भारत के दर्शकों को छू सके। खुशबू सुंदर ने कहा कि आज के समय में दर्शकों को पसंद आने वाली कहानी अलग नहीं होती, बल्कि उसकी प्रस्तुति अलग होती है। अब साउथ और हिंदी फिल्मों में ज्यादा अंतर नहीं है। कई कलाकार दक्षिण भारत से आकर हिंदी सिनेमा में न केवल स्थिर हुए हैं, बल्कि नाम भी कमाया है। क्षेत्रीय भाषा की फिल्में भी भारतीय सिनेमा का ही हिस्सा हैं।नागार्जुन ने कहा कि फिल्म की भाषा उतनी महत्वपूर्ण नहीं होती, जितना कि उसमें भारतीय संस्कृति और मानवीय भावनाओं का स्पर्श हो। फिर चाहे वह फिल्म बॉलीवुड की हो या टॉलीवुड की, कोई फर्क नहीं पड़ता। अनेक क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्में हिंदी में डब हुई हैं और होती रहती हैं। कार्थी ने कहा कि कोई भी फिल्म थोड़ी कल्पनाशील हो सकती है, लेकिन अगर उसमें ईमानदारी हो, तो वह दर्शकों तक जरूर पहुँचती है। इसी कारण हर निर्देशक सफल नहीं होता। पहली फिल्म ईमानदार होती है और कलाकार के अनुभवों पर आधारित होती है, लेकिन उसके बाद वही भावना दोहराई जाती है और वह कृत्रिम लगने लगती है। अनुपम खेर ने कहा कि आजकल कलाकार, निर्देशक और तकनीशियन अलग-अलग भाषाओं में सहजता से काम कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय दीवारें कमजोर हो रही हैं। “मैंने तेलुगु और तमिल में भी काम किया है, लेकिन हिंदी भाषा से मुझे सबसे ज़्यादा प्यार है।” उन्होंने कहा कि कोविड के बाद दक्षिण भारतीय सिनेमा में काफी बदलाव देखने को मिले हैं, लेकिन वह किसी भी भाषा का क्यों न हो, उसे भारतीय सिनेमा के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि हमें भारतीय फिल्मों को भारत तक सीमित न रखकर वैश्विक स्तर पर पहुँचाने की जरूरत है।




