
बांदा, उत्तर प्रदेश। बांदा से लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमले का एक गंभीर मामला सामने आया है, जहां रेलवे सुरक्षा बल (RPF) के जवानों पर एक महिला पत्रकार समेत तीन पत्रकारों के साथ अभद्रता, धक्का-मुक्की और अमर्यादित व्यवहार के आरोप लगे हैं। इस घटना ने न केवल पत्रकार जगत बल्कि आम जनता के बीच भी आक्रोश पैदा कर दिया है।बताया जा रहा है कि घटना 22/23 मार्च 2026 की रात की है, जब ड्यूटी पर तैनात RPF कर्मियों ने कवरेज के दौरान पत्रकारों के साथ गाली-गलौज की और कथित रूप से उनके साथ हाथापाई भी की। मामला उस समय और गंभीर हो गया जब एक महिला पत्रकार के साथ बदसलूकी की गई। पीड़ितों के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने उनका मोबाइल फोन छीनकर मेज पर पटक दिया और उनके खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं, जो महिला की गरिमा और मानवाधिकारों का उल्लंघन है।घटना के बाद 23 मार्च को सुरुचि द्विवेदी को लिखित शिकायत दी गई, लेकिन आरोप है कि शुरुआती स्तर पर मामले को दबाने का प्रयास किया गया। बाद में जांच महोबा के RPF इंस्पेक्टर को सौंपी गई, जिन्होंने कथित तौर पर आरोपी कर्मियों को ‘क्लीन चिट’ दे दी। इस पर पत्रकारों और सामाजिक संगठनों में नाराजगी और बढ़ गई।स्थानीय स्तर पर न्याय न मिलने के बाद पीड़ित पक्ष ने उच्चाधिकारियों से गुहार लगाई। मामले की गंभीरता को देखते हुए झांसी के जीआरपी सीओ सलीम खान ने संज्ञान लिया। 15 अप्रैल 2026 को उन्होंने पीड़ित पत्रकारों—रूपा गोयल, ललित कुमार और नीरज निगम—के बयान दर्ज किए। इस दौरान झांसी के वरिष्ठ पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद रहा, जिसने निष्पक्ष जांच की मांग की।सीओ सलीम खान ने भरोसा दिलाया है कि जांच पारदर्शी होगी और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। फिलहाल, पूरे मामले ने पुलिसिया कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।इस घटना को लेकर पत्रकार समुदाय में गहरा असंतोष है। बड़ा सवाल यही है कि यदि कानून की रक्षा करने वाली वर्दी ही पत्रकारों के साथ इस तरह का व्यवहार करेगी, तो आम जनता की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी। अब सभी की निगाहें झांसी से आने वाली अंतिम जांच रिपोर्ट पर टिकी हैं—क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी या मामला फिर से फाइलों में दब जाएगा।




