Friday, March 20, 2026
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भारत के सांस्कृतिक गौरव और सामरिक कवच के संरक्षकों का विरोध अनुचित

डॉ.राघवेंद्र शर्मा
भारत की संप्रभुता और सुरक्षा के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ) पर हालिया अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियां न केवल आधारहीन हैं, बल्कि एक गहरे वैचारिक पूर्वाग्रह का संकेत देती हैं। वहीं कुछ भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा राष्ट्रीय संप्रभुता के मसले पर विदेशी ताकतों के सुर में सुर मिलाना चिंता पैदा करने वाला विषय है। अमेरिकी संस्था USCIRF की रिपोर्ट में जिस तरह से इन दोनों संस्थाओं को निशाना बनाया गया है, वह सीधे तौर पर भारत की आंतरिक व्यवस्था और उसकी सुरक्षा संरचना को अस्थिर करने का प्रयास है, जो कभी सफल नहीं होगा। जब हम संघ और रॉ जैसी संस्थाओं की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि ये केवल संगठन या एजेंसियां नहीं हैं, बल्कि ये भारत के सांस्कृतिक गौरव और सामरिक कवच की संरक्षक हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले एक शताब्दी से राष्ट्र निर्माण, चरित्र निर्माण और समाज सेवा के क्षेत्र में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहा है। संघ किसी धर्म या संप्रदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और देश के कल्याण की बात करता है। प्राकृतिक आपदाओं से लेकर सामाजिक सुधारों तक, संघ के स्वयंसेवकों ने हमेशा अपनी जान की परवाह किए बिना देश के हर नागरिक की मदद की है। ऐसे में एक विदेशी संस्था द्वारा इसे धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार ठहराना हास्यास्पद और सत्य से कोसों दूर है। वास्तव में, संघ ने समाज को जोड़ने और भारतीयता के भाव को जगाने का काम किया है, जिसे धूर्ततापूर्ण नजरिए से से देखने वाली विस्तारवादी ताकतें कभी नहीं समझ पाएंगी।
​इसी तरह, भारत की खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ पर लगाए गए आरोप भी एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा लगते हैं। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए उसकी खुफिया एजेंसी उसकी पहली रक्षा पंक्ति होती है। रॉ का प्राथमिक उद्देश्य विदेशी खतरों, आतंकवाद और अलगाववाद से भारत की सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करना है। यदि कोई बाहरी ताकत भारत को अस्थिर करने की साजिश रचती है, तो उसे नाकाम करना रॉ का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रॉ के खिलाफ प्रतिबंधों की मांग करना वास्तव में भारत की सुरक्षा क्षमता को पंगु बनाने की एक वैश्विक साजिश है। साथ में इस सत्यता का प्रमाण है कि रॉ उन बाहरी ताकतों के लिए खतरा बना हुआ है जो भारत को अपने इशारे पर नचाना चाहते हैं। यही वजह है कि विदेशी धरती पर तथाकथित ‘टारगेटेड किलिंग’ के आरोपों का इस्तेमाल भारत की छवि खराब करने के लिए किया जा रहा है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत हमेशा से शांति का पक्षधर रहा है। लेकिन शांति का अर्थ कायरता नहीं है; अपनी सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताना केवल उन ताकतों का एजेंडा हो सकता है जो भारत को एक उभरती हुई शक्ति के रूप में नहीं देखना चाहतीं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब विदेशी संस्थाएं भारत की इन देशभक्त संस्थाओं पर उंगली उठाती हैं, तो देश के भीतर से ही कुछ राजनीतिक स्वर उनके समर्थन में उठने लगते हैं। राजनीति अपनी जगह है, लेकिन राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान से समझौता करना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता।
वोट बैंक की राजनीति ने आज वैचारिक विमर्श को इस कदर दूषित कर दिया है कि कुछ दल और बुद्धिजीवी बाहरी दखलंदाजी को भी जायज ठहराने लगे हैं। यह सोचना कि केवल चुनावी लाभ के लिए हम अपने ही देश की रक्षक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा कर देंगे, राष्ट्रीय एकता के लिए एक गंभीर चेतावनी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने कभी भी किसी के खिलाफ नफरत नहीं सिखाई, बल्कि उसने तो ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के दर्शन को धरातल पर उतारा है। संघ के शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा के प्रकल्प देश के दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले वंचितों के लिए आशा की किरण हैं। जब USCIRF जैसी संस्थाएं इसे प्रतिबंधित करने की बात करती हैं, तो वे वास्तव में भारत के उस जमीनी सेवा तंत्र पर प्रहार करना चाहती हैं जो सरकार के समानांतर समाज की सेवा में जुटा रहता है। इसी प्रकार, रॉ पर प्रतिबंध की सिफारिश भारत की आतंकवाद विरोधी नीति को कमजोर करने का प्रयास है। जो एजेंसियां दिन-रात सीमा पार से आने वाले खतरों का सामना करती हैं, उन्हें विदेशी दबाव में भारतीय राजनीतिक दलों द्वारा बदनाम करना राष्ट्रद्रोह के समान है। भारत को आज ऐसी बाहरी रिपोर्टों पर ध्यान देने की नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक शक्ति और एकता की आवश्यकता है।
​अंततः, यह स्पष्ट है कि संघ और रॉ जैसी संस्थाएं उन विदेशी शक्तियों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं जो भारत को अपनी शर्तों पर चलाना चाहती हैं। ये संस्थाएं भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ और ‘हार्ड पावर’ का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन पर हमला करना दरअसल भारत की रीढ़ पर हमला करना है। हमें एक राष्ट्र के रूप में यह समझना होगा कि विदेशी संस्थाओं के एजेंडे अक्सर पक्षपाती होते हैं और वे भारत के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए मानवाधिकारों या धार्मिक स्वतंत्रता जैसे संवेदनशील विषयों का ढाल के रूप में उपयोग करते हैं। भारत के हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपनी इन संस्थाओं के साथ अडिग होकर खड़ा रहे। जब तक संघ जैसे देशभक्त संगठन समाज को संस्कारित करते रहेंगे और रॉ जैसी एजेंसियां देश की सीमाओं की निगरानी करती रहेंगी, तब तक कोई भी बाहरी ताकत भारत का बाल भी बांका नहीं कर पाएगी। हमें राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर अपनी इन राष्ट्रभक्त संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि इन्हीं के दम पर आज भारत विश्व पटल पर एक स्वाभिमानी और सुरक्षित राष्ट्र के रूप में स्थापित है। बाहरी हस्तक्षेप को नकारना और अपनी स्वदेशी संस्थाओं पर विश्वास जताना ही सच्ची देशभक्ति है।

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