
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी व्यक्ति की आज़ादी सरकारी अफसरशाही और प्रशासनिक सुस्ती की भेंट नहीं चढ़ सकती। अदालत ने पैरोल मिलने के बावजूद एक दोषी को 24 दिनों तक जेल में रखने पर राजस्थान सरकार को जिम्मेदार ठहराते हुए 11 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ए.जी. मसीह की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि राज्य सरकार केवल इस वजह से किसी व्यक्ति को जेल में नहीं रख सकती कि अधिकारी यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि अदालत के आदेश के खिलाफ अपील दायर की जाए या नहीं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि एक बार किसी सक्षम न्यायालय द्वारा रिहाई का आदेश जारी कर दिया जाए, तो उसका तत्काल पालन किया जाना चाहिए। केवल उसी स्थिति में रिहाई रोकी जा सकती है, जब किसी उच्च अदालत द्वारा उस आदेश पर रोक लगाई गई हो।
व्यक्ति की स्वतंत्रता सर्वोपरि
29 मई को दिए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता ने राज्य सरकार की लापरवाही के कारण 24 दिनों की अवैध हिरासत झेली है, इसलिए वह मुआवजे का हकदार है। खंडपीठ ने कहा कि यदि राज्य का यह तर्क स्वीकार कर लिया जाए कि अपील दाखिल करने पर विचार चल रहा था, इसलिए रिहाई नहीं की गई, तो इसका अर्थ होगा कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रशासनिक निर्णयों से भी कम महत्व दिया जा रहा है। अदालत ने इसे पूरी तरह अस्वीकार्य बताया। न्यायालय ने कहा कि किसी व्यक्ति के दोषसिद्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि उसके संवैधानिक और कानूनी अधिकार समाप्त हो जाते हैं। न्याय के तराजू पर उसके अधिकारों का मूल्य कम नहीं आंका जा सकता।
सरकार की सुस्त प्रक्रिया का खामियाजा नागरिक क्यों भुगते?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जमानतदारों का सत्यापन पहले ही पूरा हो चुका था और रिहाई में देरी का कोई ठोस कारण नहीं था। अदालत ने माना कि सरकारी प्रक्रियाओं में समय लग सकता है, लेकिन यह सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है कि उसकी प्रशासनिक देरी का खामियाजा उस व्यक्ति को न भुगतना पड़े, जिसे अदालत ने स्वतंत्रता प्रदान कर दी है। कोर्ट ने राजस्थान सरकार को निर्देश दिया कि 11 लाख रुपये की मुआवजा राशि सीधे अपीलकर्ता के बैंक खाते में जमा कराई जाए।
फैसले में जॉर्ज वाशिंगटन के कथन का उल्लेख
फैसले की शुरुआत में न्यायमूर्ति संजय करोल ने अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन के कथन का उल्लेख करते हुए कहा- मनमानी शक्ति सबसे आसानी से तब स्थापित होती है, जब स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके उसे पूरी तरह नष्ट कर दिया जाता है। उन्होंने कहा कि यह मामला अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में न्यायालय के समक्ष आया है।
क्या था पूरा मामला?
मामला दाऊदयाल नामक व्यक्ति से जुड़ा है, जिसे वर्ष 1967 के एक मामले में 1988 में दोषी ठहराया गया था। निचली अदालत ने उसे चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। उस पर गैरकानूनी जमावड़ा, घर में जबरन प्रवेश और गैर-इरादतन हत्या जैसे आरोप थे। वर्ष 2021 में राजस्थान हाई कोर्ट ने उसकी सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा, जिसके बाद उसे जेल भेज दिया गया। सजा के दौरान उसने 2023 में स्थायी पैरोल के लिए आवेदन किया, जिसे जेल प्रशासन ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद दाऊदयाल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 5 नवंबर 2024 को हाई कोर्ट की एकल पीठ ने कुछ शर्तों के साथ उसे पैरोल पर रिहा करने का आदेश दिया। उसने सभी शर्तों का पालन किया और 13 नवंबर 2024 तक जमानतदारों का सत्यापन भी पूरा हो गया, लेकिन इसके बावजूद उसे जेल से रिहा नहीं किया गया। बाद में हाई कोर्ट की खंडपीठ ने 6 दिसंबर 2024 को तत्काल रिहाई का आदेश दिया। रिहा होने के बाद दाऊदयाल ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर उस अवधि के लिए मुआवजे की मांग की, जब पैरोल आदेश होने के बावजूद उसे जेल में रखा गया था।
संवैधानिक अधिकारों पर महत्वपूर्ण संदेश
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य की जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि प्रशासनिक लापरवाही या निर्णयहीनता के कारण किसी नागरिक की स्वतंत्रता का हनन स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसी स्थिति में राज्य को जवाबदेह ठहराया जाएगा।



