HomeArchitectureपंजाब में खेती: स्मार्ट फार्मिंग या स्मार्ट धोखा?

पंजाब में खेती: स्मार्ट फार्मिंग या स्मार्ट धोखा?

सुभाष आनंद
आज पंजाब घटते भूजल, गिरती मिट्टी की सेहत, खत्म होती जैव-विविधता, बढ़ती कीट-रोधकता, बढ़ते कृषि खर्चों, घटती आमदनी और ग्रामीण संकट का सामना कर रहा है। जो गांव कभी आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार थे, वहां परंपरागत कलाएं, हस्तशिल्प और स्थानीय रोजगार धीरे-धीरे खत्म हो गया है। रासायनिक खेती के छह दशकों के बाद हम उस मॉडल के परिणाम भुगत रहे हैं, जिसने उत्पादन को केंद्र में रखा लेकिन प्रकृति को हाशिए पर धकेल दिया। अब समय आ गया है जब हमें इस मॉडल की बुनियादी समीक्षा करनी चाहिए, जबकि इसी समय हमारी कई संस्थाएं इसे और तकनीक-निर्भर बनाने में जुटी हुई हैं।
उच्च उपज वाली किस्मों, रासायनिक खादों और कीटनाशकों की जगह अब ड्रोन्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), सेंसर, रोबोटिक्स, ऑटोमेशन, डाटा एनालिटिक्स और तथाकथित स्मार्ट फार्मिंग की बात हो रही है। यह शब्दावली आधुनिक है, तकनीक प्रभावशाली लगती है, लेकिन इस नए वादे को गले लगाने से पहले किसानों को एक बुनियादी सवाल जरूर पूछना चाहिए, आखिर हम असल में किस समस्या का हल ढूंढ रहे हैं? क्या पंजाब की कृषि संकट में इसलिए है कि हमारे पास पर्याप्त ड्रोन नहीं हैं? क्या हमारी मिट्टियां इसलिए बेजान हो रही हैं कि उनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता की कमी है? क्या परागण करने वाले कीड़े इसलिए गायब हो रहे हैं कि खेती अभी पर्याप्त डिजिटल नहीं हुई? क्या भूमिगत पानी इसलिए घट रहा है कि खेतों में सेंसर नहीं लगे? क्या किसान इसलिए कर्ज़ में डूबे हैं कि उनके पास ऑटोमेशन की कमी है? इसका जवाब साफ है। पंजाब का संकट तकनीक का संकट नहीं है, यह एक पर्यावरण और पारिस्थितिकी का संकट है। इस विरोधाभास की सबसे स्पष्ट मिसाल खेतीबाड़ी में ड्रोन के प्रति बढ़ता आकर्षण है। ड्रोन स्मार्ट फार्मिंग का प्रतीक बन गया है। इसे प्रगति, आधुनिकीकरण और कार्यकुशलता का प्रतीक बताया जाता है लेकिन सवाल ये है कि प्रगति किस दिशा में? पंजाब में ड्रोन को मुख्य रूप से कीटनाशकों और खरपतवारनाशकों के छिडक़ाव के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। हमें कहा जाता है कि इससे मजदूरी की बचत होगी, शुद्धता बढ़ेगी और कार्यकुशलता सुधरेगी। लेकिन किस काम की कार्यकुशलता? अगर ग्लायफोसेट ड्रोन के जरिए छिडक़ा जाए तो क्या वह सुरक्षित हो जाता है? अगर कीटनाशक कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लगाए जाएं तो क्या तितलियां मरना बंद कर देती हैं? अगर खरपतवारनाशक जीपीएस से नियंत्रित हो तो क्या मधुमक्खियों को कोई नुकसान नहीं होता? अगर रसायनों का छिडक़ाव ऑटोमेटिक हो जाए तो क्या मिट्टी के सूक्ष्म जीव बच जाते हैं? जहर तो जहर ही रहता है, उसके पारिस्थितिक प्रभाव भी वही रहते हैं, बदलता है तो सिर्फ उसे फैलाने का तरीका।
निर्देशक खेती विरासत मिशन मुख्य कार्यालय गंगसर जैतू पंजाब के अनुसार असल में ड्रोन उस समस्या को और गहरा कर सकते हैं, जिसका हल बताकर उन्हें बेचा जा रहा है। जब कीटनाशक और खरपतवारनाशक छिडक़ना और आसान, तेज और सस्ता हो जाता है, तो उन पर निर्भरता घटने की बजाय बढऩे की संभावना होती है। हम रसायनों से मुक्ति के रास्ते खोजने की बजाय रसायनों को और सुविधाजनक ढंग से इस्तेमाल करने के तरीके खोज रहे हैं। यह कोई पारिस्थितिक प्रगति नहीं है, यह पारिस्थितिक पतन को तकनीक का चोला पहनाने जैसा है। एक मधुमक्खी यह नहीं जानती कि जहर पिठ्ठू पम्प से आया है, ट्रैक्टर से या ड्रोन से। एक तितली के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता कि कीटनाशक जीपीएस से छिडक़ा गया या हाथ से। मिट्टी के सूक्ष्म जीवों के लिए भी यह अहम नहीं कि खरपतवारनाशक किस तकनीक से लगाया गया। नतीजा वही रहता है। यही वो सवाल है जो हमारी यूनिवर्सिटियों को खुद से पूछना चाहिए? हम कीटनाशकों को और कुशलता से छिडक़ने के तरीके खोजने में इतनी बौद्धिक ऊर्जा क्यों लगा रहे हैं, जबकि किसानों को कीटनाशकों की निर्भरता से मुक्त करने के बारे में बहुत कम सोच रहे हैं? यह तकनीक विरोध का सवाल नहीं है,सवाल यह है कि तकनीक प्रकृति की सेवा कर रही है, या उसकी जगह ले रही है। खेती कोई इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं है। यह मिट्टी, पानी, पौधों, पशुओं, कीटों और मानव समाज के बीच जीवंत रिश्ता है। लेकिन स्मार्ट फार्मिंग की तमाम चर्चाओं में प्रकृति गायब है। ड्रोन हैं, अल्गोरिदम हैं, सेंसर हैं, सॉफ्टवेयर हैं, लेकिन जीवंत मिट्टी नहीं, जैव-विविधता नहीं,परागण करने वाले कीड़े नहीं, परंपरागत बीज नहीं,कृषि-वनीकरण नहीं,मिश्रित खेती नहीं। स्मार्ट शब्द बार-बार सुनने मिलता है। जीवंत शब्द बहुत कम, जबकि खेती को असल में जिंदा रखने वाली चीज़ जीवंत प्रकृति ही है।
इसी दौरान आंध्र प्रदेश में रायतु साधिकार संस्था द्वारा चलाए जा रहे कम्युनिटी मैनेज्ड नेचरल फार्मिंग प्रोग्राम ने दुनिया को एक अलग रास्ता दिखाया है। वहां लाखों किसान ये नहीं सीख रहे कि कीटनाशकों को और अधिक कुशलता से कैसे छिडक़ा जाए। वह यह सीख रहे हैं कि कीटनाशकों की जरूरत कैसे घटाई जाए। वहां जीवंत मिट्टी, जैव विविधता, सूक्ष्म जीव, प्राकृतिक कीट प्रबंधन, और स्थानीय संसाधनों को खेती की बुनियाद बनाया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप कृषि खर्च कम हुए हैं, किसानों की वास्तविक आय बढ़ी है, मिट्टी की जैविक सक्रियता सुधरी है, कर्ज पर निर्भरता घटी है और जैव-विविधता में सुधार के संकेत मिले हैं। हालिया अध्ययनों ने प्राकृतिक खेती वाले क्षेत्रों में पक्षियों की संख्या और विविधता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की है। एक मॉडल रासायनिक खेती को और कुशल बनाना चाहता है, दूसरा मॉडल प्रकृति की प्रक्रियाओं को और समर्थ बनाना चाहता है। एक मॉडल मशीनों पर निर्भरता बढ़ाता है। दूसरा प्रकृति की बुद्धि पर भरोसा करता है।
पंजाब के लिए सबसे बड़ी चुनौती आज तकनीक नहीं है,सबसे बड़ी चुनौती बौद्धिक है। पंजाब को दो काम करने होंगे। पहला, पंजाब को रासायनिक-केंद्रित अधिक उपज ही सफलता है वाली सोच को छोडऩा होगा। हमें यह समझना होगा कि खेती की सफलता सिर्फ क्विंटलों में नहीं आंकी जा सकती। मिट्टी की सेहत, जैव विविधता, पानी की सुरक्षा, किसान की खुशहाली और गांवों की मजबूती भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
दूसरा, पंजाब को दूसरों से सीखने की विनम्रता विकसित करनी होगी। आज पंजाब ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है। अगर हम बीते समय की धारणाओं से चिपके रहे और दुनिया पारिस्थितिक पुनर्जागरण की ओर बढ़ती रही, तो संभव है कि हम टिकाऊ खेती की ओर जाने वाली आखिरी बस ही खो बैठें। पंजाब अभी भी दुनिया को रास्ता दिखा सकता है। पर इक्कीसवीं सदी की आधुनिकता रसायनों, और मशीनों या और तकनीकी प्रणालियों से नहीं आएगी। यह तब आएगी जब हम यह साबित कर देंगे कि उत्पादक खेती, स्वस्थ मिट्टी, भरपूर जैव-विविधता, खुशहाल किसान और जीवंत गांव एक साथ भी फल-फूल सकते हैं। उस यात्रा के लिए, पंजाब को पहले भूलना पड़ेगा, फिर सीखना पड़ेगा। नहीं तो पंजाब टिकाऊ भविष्य की ओर जाने वाली आखिरी बस खो सकता है। भूलना पड़ेगा कि केवल अधिक उपज ही खेती की सफलता का मानदंड है। भूलना पड़ेगा कि हर नई तकनीक अपने आप में प्रगति होती है। भूलना पड़ेगा कि प्रकृति की सीमाओं को नजरअंदाज करके भी विकास संभव है। भूलना पड़ेगा कि मिट्टी, पानी, जैव-विविधता और ग्रामीण समाज की कीमत पर हासिल की गई समृद्धि स्थाई हो सकती है। अब हमें सीखना पड़ेगा कि खेती केवल उत्पादन की प्रणाली नहीं, बल्कि जीवन को पालने वाली एक पर्यावरणीय प्रणाली है। सीखना पड़ेगा कि प्रकृति से टकराव नहीं, साझेदारी ही टिकाऊ खुशहाली का रास्ता है। सीखना पड़ेगा कि असल प्रगति वही है जो किसान को अधिक आत्मनिर्भर बनाए, न कि उसे और अधिक बाहरी निर्भरताओं के जाल में फंसाए। सीखना पड़ेगा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में उभर रहे नए प्रयोगों, प्राकृतिक खेती के सफल मॉडलों और जीवंत मिट्टी-आधारित खेती प्रणालियों से भी बहुत कुछ सीखने को है। सबसे अधिक, पंजाब को यह सीखना पड़ेगा कि किसी भी समाज की महानता इसमें नहीं है कि उसने अतीत में क्या हासिल किया था,उसकी महानता इसमें है कि वह बदलते समय की चुनौतियों को कितनी ईमानदारी से समझता है और अपने रास्ते को कितनी बुद्धिमानी से बदल सकता है। इतिहास हमें सिखाता है कि जो समाज समय की चेतावनी को अनसुना कर देते हैं, वे अंत में अपने ही बनाए भुलावों के कैदी बन जाते हैं। आज का फैसला केवल खेती के भविष्य का फैसला नहीं है, यह पंजाब की धरती, पानी, गांवों, किसानों और आने वाली पीढियों के भविष्य का भी फैसला है। इसलिए यह समय खुद को धोखा देने का नहीं, बल्कि सच्चाई से देख पाने का है, क्योंकि मौके बार-बार नहीं आते। कुछ बसें जिंदगी में एक ही बार आती हैं। अगर वह छूट जाएं, तो फिर लंबा इंतज़ार भी मंजिल तक नहीं पहुंचा सकता। (लेखक पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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