Sunday, May 10, 2026
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संपादकीय: नैतिकता बनाम अवसरवाद!

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भारतीय राजनीति में एक पुरानी कहावत आज बिल्कुल सटीक बैठती दिखाई देती है—“गिरगिट की तरह रंग बदलना।” फर्क सिर्फ इतना है कि अब गिरगिट भी नेताओं के सामने स्वयं को असफल महसूस करे। नेता जिस तेजी से अपनी विचारधारा, निष्ठा और राजनीतिक आस्था बदलते हैं, वह लोकतंत्र की आत्मा पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। दूसरी कहावत है—“घड़ियाली आंसू बहाना।” राजनीति में यह गुण अब लगभग अनिवार्य पात्रता बन चुका है। जनता के सामने कृत्रिम संवेदनाएं दिखाना, कैमरों के सामने रोना, दुख व्यक्त करना और पर्दे के पीछे सत्ता-समीकरण साधना आज की राजनीति का स्थायी चरित्र बन गया है। भारतीय संविधान की मूल भावना यह थी कि जनता अपने मताधिकार से प्रतिनिधि चुनेगी और वही प्रतिनिधि सदन में नेता का चयन करेंगे। लेकिन आज स्थिति उलटती दिखाई देती है। अब ऐसा प्रतीत होता है मानो नेता ही मतदाता तय करने लगे हों। चुनावी प्रक्रियाओं, मतदाता सूची संशोधन, एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं और राजनीतिक प्रभावों को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। विभिन्न राज्यों में दूसरे प्रदेशों से लोगों को लाकर मतदान कराने, चुनावी मशीनरी के दुरुपयोग और आचार संहिता उल्लंघन के आरोप लोकतंत्र की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं। सोशल मीडिया और स्वतंत्र पत्रकारों द्वारा अनेक वीडियो और दावे सामने आते हैं, जिनसे जनता के भीतर संशय बढ़ता है कि चुनावी प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष रह गई है। आज राजनीति में सबसे बड़ा संकट वैचारिक प्रतिबद्धता का है। जनता जिस प्रतिनिधि को चुनती है, वह कुछ समय बाद ही दूसरी पार्टी में शामिल होकर उसी विचारधारा का विरोध करने लगता है, जिसके नाम पर चुनाव जीता था। यह केवल राजनीतिक बदलाव नहीं बल्कि मतदाताओं के विश्वास का संकट है। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का बीजेपी में शामिल होना इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। जिस दल ने उन्हें पहचान, पद और राष्ट्रीय मंच दिया, उसी दल को छोड़ देना राजनीतिक अवसरवादिता का उदाहरण माना जा सकता है। किसी पार्टी के सांसद का दूसरी पार्टी में जाना केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं होता, बल्कि लाखों मतदाताओं की भावनाओं से जुड़ा विषय होता है। राघव चड्ढा जैसे नेताओं का उदाहरण बताता है कि राजनीति में वैचारिक संघर्ष से अधिक महत्व अब शक्ति-संतुलन और राजनीतिक भविष्य का हो गया है। कल तक जो नेता किसी पार्टी की नीतियों की आलोचना करता है, वही कुछ समय बाद उसी पार्टी का समर्थक बन जाता है। इससे जनता के भीतर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर राजनीति में सिद्धांत बचा कहां है?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह बन गई है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि जनता से अधिक अपने राजनीतिक दल के प्रति जवाबदेह हो गए हैं। संसद और विधानसभाओं में व्हिप जारी होने के बाद अधिकांश प्रतिनिधि अपनी व्यक्तिगत राय तक व्यक्त नहीं कर सकते। यदि कोई पार्टी लाइन से हटकर वोट देता है तो अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। यानी जनप्रतिनिधि स्वतंत्र चिंतक नहीं बल्कि पार्टी-निर्देशों का पालन करने वाले सदस्य बनकर रह गए हैं। इस स्थिति में जनता के मुद्दे गौण हो जाते हैं और राजनीतिक दल सर्वोच्च शक्ति बन जाते हैं। लोकतंत्र में व्यक्ति जनता का प्रतिनिधि होना चाहिए, लेकिन व्यवहार में वह दल का प्रतिनिधि बनकर रह गया है। कांग्रेस सरकार के खिलाफ हुए अन्ना आंदोलन ने भारतीय राजनीति को नया मोड़ दिया। रामलीला मैदान से उठी उस लहर ने अरविंद केजरीवाल और उनके सहयोगियों को राष्ट्रीय पहचान दी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में अभूतपूर्व सफलता हासिल की। दिल्ली सरकार के दौरान सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं पर किए गए कार्यों की व्यापक चर्चा हुई। इन कार्यों का प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि पंजाब में भी पार्टी की सरकार बनी। लेकिन जैसे-जैसे पार्टी का विस्तार हुआ, आंतरिक मतभेद और राजनीतिक संघर्ष भी सामने आने लगे। पुराने सहयोगियों का पार्टी से अलग होना, नेतृत्व शैली पर प्रश्न उठना और फिर राज्यसभा सांसदों के दल बदल तक पहुंचना यह दिखाता है कि भारतीय राजनीति में वैचारिक स्थिरता बनाए रखना कितना कठिन हो गया है। भारतीय राजनीति में यह धारणा भी मजबूत होती जा रही है कि जांच एजेंसियों का उपयोग राजनीतिक दबाव के लिए किया जाता है। ईडी, सीबीआई और आयकर विभाग की कार्रवाइयों पर अक्सर विपक्षी दल सवाल उठाते रहे हैं। आरोप लगाए जाते हैं कि सत्ता विरोधी नेताओं पर कार्रवाई तेज होती है जबकि सत्ता में शामिल होते ही वही नेता “स्वच्छ” घोषित कर दिए जाते हैं। यही कारण है कि दल बदल को कई लोग वैचारिक परिवर्तन नहीं बल्कि “राजनीतिक सुरक्षा कवच” प्राप्त करने का माध्यम मानते हैं। भारतीय राजनीति में अभी भी कुछ ऐसे नेता हैं जिन्होंने सत्ता या टिकट न मिलने के बावजूद अपनी वैचारिक निष्ठा नहीं छोड़ी। वरुण गांधी और मेनका गांधी जैसे उदाहरण अक्सर दिए जाते हैं कि उन्होंने कई मुद्दों पर किसानों, मजदूरों और आम जनता की आवाज उठाई, भले ही उन्हें राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा हो। लेकिन ऐसे उदाहरण अब अपवाद बनते जा रहे हैं। राजनीति में नैतिकता ढूंढना सचमुच रेगिस्तान में सुई खोजने जैसा कठिन प्रतीत होने लगा है। लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—जनता के प्रति जवाबदेही, वैचारिक ईमानदारी और संवैधानिक मर्यादा। यदि नेता बार-बार अपनी निष्ठा बदलते रहें, राजनीतिक दल सत्ता के लिए किसी भी सिद्धांत से समझौता कर लें और जनता केवल चुनावी गणित बनकर रह जाए, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे केवल औपचारिक व्यवस्था बन जाता है। व्यक्ति पूजा, अंधभक्ति और अवसरवाद लोकतंत्र को भीतर से कमजोर करते हैं। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की जागरूकता और प्रश्न पूछने की क्षमता में होती है। जिस दिन जनता केवल भावनाओं, नारों और मुफ्त की घोषणाओं के आधार पर निर्णय लेने लगेगी, उसी दिन लोकतंत्र की आत्मा सबसे अधिक संकट में पड़ जाएगी। अंततः राजनीति का उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं बल्कि जनसेवा होना चाहिए। लेकिन जब राजनीति सेवा से अधिक व्यवसाय बन जाए, तब नैतिकता सबसे पहले बलि चढ़ती है। यही आज भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है।

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