
वैसे युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है। लेकिन भारत के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था पाकिस्तानी आतंकियों के ठिकानों को नष्ट करना, जिसमें दो दिन की देरी हुई लेकिन सिंदूर ऑपरेशन सफल रहा। हमारी सेना प्रशंसा की पात्र है जिसने आतंकियों के ठिकानों पर सटीक हमला किया। इतना ही नहीं, भारतीय जांबाज़ सेना ने पाकिस्तान के महत्वपूर्ण हवाईअड्डे पर हमला किया, जहां से थोड़ी ही दूरी पर पाकिस्तानी अणु बमों और मिसाइलों का जखीरा है। जिससे पाकिस्तान से अधिक डर अमेरिका को लगा, क्योंकि जखीरे की हिफाजत में अमेरिकी अधिकारी लगे हैं ताकि आतंकवादियों के हाथ न लगे, वर्ना आतंकवादी उसका उपयोग अमेरिका पर ही करेंगे। पेंटागन इस सूचना से डर गया और ट्रंप सरकार से अपनी चिंता जताई। फिर ट्रंप ने सीजफायर के लिए दोनों देशों को तैयार करने हेतु उपराष्ट्रपति और विदेश मंत्री पर कार्यभार सौंपा।
भारत को व्यापार न करने की धमकी देकर डराया-धमकाया गया। दुर्भाग्य से भारत में जल्दीबाजी हुई, कम से कम सेना से परामर्श तो किया जाना चाहिए था। सेना की अग्रिम कार्रवाई की जानकारी लेनी थी, क्योंकि भारतीय सेना ने जिस तरह पाकिस्तानी बमों और मिसाइलों पर सटीक निशाना लगाने की तैयारी कर ली होगी, बातचीत में दो दिन निकालकर भारतीय सेना को कार्रवाई कर पाकिस्तानी अणु जखीरे को खत्म करने का समय देना था। मगर अमेरिकी धमकी के आगे भारत सरकार डर गई और सीजफायर के लिए राजी हो गई। विपक्षियों का सवाल जायज है- भारत के मामले का फैसला करने वाला अमेरिकी कौन है? उन्हें यह अधिकार किसने दिया? इसका उत्तर मोदी को देना होगा, आज या कल। मोदी ने अपने संबोधन में एक बार भी विपक्षी दलों के समर्थन की चर्चा नहीं की। जनता की एकजुटता की बात जरूर की- तो क्या माना जाए कि अब हिंदू-मुस्लिम करना बंद कर देंगे? गोदी मीडिया पर रोक लगाएंगे, जो गलत खबरें देश को देकर अंधेरे में रखना चाहती थी? मोदी ने अपने भाषण में वही घिसी-पिटी बातें दोहराई। आतंकवाद पर जरूर बोले। जब द्विपक्षीय वार्ता होगी तो पीओके और आतंकवाद पर चर्चा की बात कही, लेकिन पाकिस्तान को आतंकवादी पालने से रोकने के कोई विकल्प नहीं सुझाए।सवाल है — ट्रंप ने धमकी देकर सीजफायर का श्रेय भी खुद ले लिया। क्या ट्रंप सीजफायर कराकर पाकिस्तानी आतंकवाद पर रोक लगाएंगे? क्या पाकिस्तान फिर से आतंकी भारत में नहीं भेजेगा — इसकी गारंटी ट्रंप को लेने के लिए कहना होगा। इसके अलावा भी मोदी से कई सवाल पूछे जाएंगे। सीजफायर के बाद संसद का सत्र तुरंत बुलाना चाहिए था और बताना चाहिए था कि ट्रंप के दबाव में सीजफायर को राजी क्यों हुए? सर्वदलीय बैठक में क्यों नहीं आए? सभी दलों की बैठक में आकर विपक्षी दलों को विश्वास में लेना चाहिए था। लेकिन मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार करने की जल्दी क्या थी? चुनाव ज़रूरी है या देश की सुरक्षा? सवाल आज नहीं तो कल विपक्ष पूछेगा ही कि आतंकी आराम से कैसे पहुंचे? बड़े इत्मीनान से गोलियां मारी — धर्म पूछकर। ऐसा पहली बार क्यों हुआ? आतंकी कहां गए? उनका पता क्यों नहीं लगाया गया? सरकार पहलगाम में सुरक्षा व्यवस्था के प्रति लापरवाह थी या जानबूझकर आतंकियों को मौका दिया गया? कर्नल सोफिया और दलित विंग कमांडर व्योमिक सिंह दलित को सामने लाने के बाद क्या भारत में हिंदू-मुस्लिम नहीं किया जाएगा? दलितों को घोड़ी पर चढ़ने दिया जायेगा? करनी सेना को क्या भविष्य में तलवारें और बंदूकें लहराकर विपक्षी नेताओं को जान से मारने की फिर अनुमति और समर्थन नहीं दिया जाएगा? इन सारे सवालों के अलावा इस सवाल का भी उत्तर देना होगा। पुलवामा में आतंकी घटना में शामिल आतंकियों को क्यों नहीं पकड़ा गया? आरडीएक्स कहां से आया। इसका उत्तर क्या है सरकार के पास?तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के आरोपों का भी जवाब देना होगा। सरकार अपनी सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।




