Thursday, May 14, 2026
Google search engine
HomeIndiaसंपादकीय: चीन की अमेरिका को दो टूक!

संपादकीय: चीन की अमेरिका को दो टूक!

विश्व राजनीति तेजी से ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है जहाँ महाशक्तियों के बीच अविश्वास, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, सैन्य तनाव और वैचारिक टकराव एक नए शीतयुद्ध जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता तनाव केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ताइवान, दक्षिण चीन सागर, ईरान, रूस और वैश्विक शक्ति संतुलन तक फैल चुका है। ऐसे समय में विश्व के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आने वाला वैश्विक ढांचा कैसा होगा—क्या दुनिया दो शक्ति ध्रुवों में विभाजित होगी, या फिर बहुध्रुवीय व्यवस्था उभरेगी? चीन ने अमेरिका के साथ किसी भी उच्चस्तरीय वार्ता से पहले अपनी स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित कर दी हैं। चीन ने साफ कर दिया कि ताइवान उसके लिए आंतरिक मामला है और उस पर कोई समझौता या बहस स्वीकार्य नहीं होगी। इसी प्रकार चीन ने मानवाधिकार, उसकी न्याय व्यवस्था और उसकी विकास नीति में अमेरिकी दखल को भी अस्वीकार कर दिया। दरअसल चीन यह संदेश देना चाहता है कि वह अब 1990 के दशक वाला कमजोर चीन नहीं है जिसे पश्चिमी दबावों के आगे झुकना पड़े। चीन अमेरिका के साथ संबंध चाहता है, लेकिन बराबरी के स्तर पर। यही कारण है कि वह “रणनीतिक, रचनात्मक और स्थिर संबंधों” की बात तो करता है, परंतु अपनी संप्रभुता से जुड़े प्रश्नों पर किसी प्रकार की रियायत नहीं देना चाहता। अमेरिका द्वारा ताइवान को अरबों डॉलर के हथियार देने की घोषणाएँ चीन को लगातार उकसाने वाली मानी जाती हैं। चीन ताइवान को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है, जबकि अमेरिका “वन चाइना पॉलिसी” स्वीकार करने के बावजूद व्यवहारिक रूप से ताइवान को सामरिक समर्थन देता रहा है। यही कारण है कि ताइवान आज केवल एक द्वीप नहीं, बल्कि अमेरिका-चीन शक्ति संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। यदि भविष्य में ताइवान को लेकर कोई बड़ा सैन्य संघर्ष होता है, तो उसका प्रभाव केवल एशिया तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेगा। डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति लंबे समय से यह मानी जाती रही है कि विश्व व्यवस्था को दो बड़े शक्ति केंद्रों—अमेरिका और चीन—के इर्द-गिर्द संगठित किया जाए। इस सोच के अनुसार अन्य देश इन दोनों में से किसी एक खेमे के साथ जुड़ सकते हैं। लेकिन यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न रूस का है। रूस स्वयं को अभी भी महाशक्ति मानता है और वह किसी अमेरिकी या चीनी धुरी का “अनुयायी” बनने को तैयार नहीं दिखाई देता। यूक्रेन युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि रूस पश्चिमी दबावों के बावजूद लंबे संघर्ष की क्षमता रखता है। यदि नाटो देशों द्वारा यूक्रेन को सैन्य सहायता नहीं मिलती, तो स्थिति संभवतः बहुत पहले बदल चुकी होती। इसलिए भविष्य की विश्व व्यवस्था केवल द्विध्रुवीय होगी, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। रूस, भारत, यूरोप, तुर्किये, ईरान और खाड़ी देशों की भूमिका भी निर्णायक रहेगी। ईरान और इजरायल से जुड़े संघर्षों ने नाटो देशों के भीतर भी मतभेद उजागर कर दिए हैं। कुछ यूरोपीय देश अमेरिका की हर सैन्य रणनीति का खुला समर्थन करने से बचते दिखाई देते हैं। ब्रिटेन जैसे पारंपरिक सहयोगी भी कई बार सतर्क दूरी बनाते दिखाई दिए हैं। यदि अमेरिका लगातार एकतरफा सैन्य कार्रवाइयों पर जोर देता है, तो यूरोप के भीतर यह बहस और तेज हो सकती है कि क्या यूरोप को अपनी स्वतंत्र सामरिक नीति अपनानी चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप को पहले ही आर्थिक और ऊर्जा संकट में डाल दिया है। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका और इजरायल लंबे समय से चिंतित रहे हैं। आरोप लगाया जाता रहा है कि ईरान परिष्कृत यूरेनियम के माध्यम से परमाणु क्षमता विकसित करना चाहता है। दूसरी ओर ईरान का दावा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। यदि वास्तव में ईरानी परमाणु प्रतिष्ठानों पर बड़े हमले हुए हों, तो भी यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि संवेदनशील सामग्री पूरी तरह नष्ट हो गई होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि भूमिगत संरचनाओं और जटिल परमाणु सुविधाओं को पूरी तरह निष्क्रिय करना अत्यंत कठिन कार्य होता है। यही कारण है कि अमेरिका के सामने सैन्य कार्रवाई के साथ-साथ राजनीतिक और रणनीतिक चुनौतियाँ भी हैं। जमीनी हस्तक्षेप का अर्थ होगा लंबे समय तक सैन्य उपस्थिति, भारी आर्थिक बोझ और क्षेत्रीय प्रतिरोध का सामना। चीन और रूस दोनों ईरान को पश्चिम एशिया में एक महत्वपूर्ण साझेदार मानते हैं। ऊर्जा, व्यापार और भू-राजनीतिक संतुलन के कारण दोनों देश ईरान के साथ संबंध बनाए रखना चाहते हैं। यदि अमेरिका ईरान पर अत्यधिक दबाव बनाता है, तो संभावना है कि चीन और रूस अप्रत्यक्ष रूप से ईरान को समर्थन दें। इससे संघर्ष और जटिल हो सकता है। चीन विशेष रूप से पश्चिम एशिया में अपनी आर्थिक उपस्थिति मजबूत करना चाहता है क्योंकि उसकी ऊर्जा आवश्यकताएँ बड़े पैमाने पर इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं। भारत इस पूरे शक्ति संघर्ष के बीच अत्यंत संवेदनशील स्थिति में है। एक ओर अमेरिका के साथ उसके सामरिक और आर्थिक संबंध मजबूत हुए हैं, वहीं दूसरी ओर रूस लंबे समय से उसका रक्षा साझेदार रहा है। चीन भारत का पड़ोसी और बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। ऐसे में भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या वह किसी एक ध्रुव के साथ पूरी तरह खड़ा होगा, या फिर पुरानी गुटनिरपेक्ष नीति जैसी संतुलित कूटनीति अपनाएगा। भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, रक्षा खरीद और भू-राजनीतिक हित इतने विविध हैं कि किसी एक शक्ति केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता उसके लिए जोखिमपूर्ण हो सकती है। यदि पश्चिम एशिया में युद्ध लंबा खिंचता है, तो तेल और गैस की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। इसका सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर पड़ेगा। महंगाई, परिवहन लागत, खाद्य संकट और औद्योगिक उत्पादन पर इसका प्रभाव दिखाई दे सकता है। हॉर्मूज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धुरी माना जाता है। यदि वहाँ अस्थिरता बढ़ती है, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। भारत के लिए सबसे व्यावहारिक नीति यही हो सकती है कि वह बहुध्रुवीय संतुलन बनाए रखे। अमेरिका, रूस, चीन, यूरोप और खाड़ी देशों—सभी के साथ संतुलित संबंध भारत के दीर्घकालिक हित में होंगे। साथ ही भारत को अपनी ऊर्जा आत्मनिर्भरता, रक्षा उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक मजबूती पर विशेष ध्यान देना होगा। वैश्विक संकटों के समय वही देश स्थिर रह पाते हैं जिनकी आंतरिक आर्थिक और सामाजिक संरचना मजबूत होती है।
विश्व राजनीति ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहाँ गठबंधन तेजी से बदल रहे हैं और शक्ति संतुलन पुनर्गठित हो रहा है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा, रूस-यूक्रेन युद्ध, ईरान संकट और पश्चिम एशिया की अस्थिरता आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेंगे। भारत के सामने चुनौती केवल विदेश नीति की नहीं, बल्कि रणनीतिक आत्मनिर्भरता की भी है। किसी भी महाशक्ति के अत्यधिक प्रभाव में जाने के बजाय संतुलित, स्वतंत्र और दीर्घदृष्टि वाली नीति ही भारत को वैश्विक संकटों से सुरक्षित रख सकती है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments