Sunday, March 22, 2026
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संपादकीय: मौलिक अधिकारों का हनन है अजातिगत आरक्षण!

राजनीतिक दलों ने हर दस साल पर आरक्षण को दस-दस साल बढ़ाया, वोट बैंक के लिए, क्योंकि आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए किया गया था। जातीय आरक्षण संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ है। इमरजेंसी छोड़कर किसी भी हालत में मौलिक अधिकार स्थगित नहीं किए जा सकते। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से लेकर 18 तक समानता के अधिकार वर्णित हैं। अनुच्छेद 14 कहता है, कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं। अनुच्छेद 15 में कहा गया है, जाति, लिंग, भाषा और जन्मस्थान के आधार पर भी भेदभाव नहीं किया जा सकता। जबकि अनुच्छेद 16 में लिखा है, सरकारी नौकरी (सार्वजनिक रोजगार) में समस्त नागरिकों को समान अवसर प्राप्त होंगे। अनुच्छेद 17 के अनुसार देश में अस्पृश्यता, यानी छुआछूत का अंत किया गया, जबकि अनुच्छेद 18 में सेना और शिक्षा को छोड़कर उपाधियों का अंत कर दिया गया है। यदि हम संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के आलोक में देखें, तो आरक्षण मौलिक अधिकारों का हनन करता है, जो समानता के अवसर के खिलाफ है। इसलिए आरक्षण गैर-संवैधानिक प्रमाणित होता है। इसलिए आरक्षण को पूरी तरह खत्म कर देना ही संविधान की उद्देशिका में वर्णित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक न्याय होगा। आरक्षण देश के नाम पर कलंक है, जिसके आधार पर जहां प्रतिभाओं का तिरस्कार होता है, वहीं अक्षम, अयोग्य लोगों को डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर, शिक्षक, आईएएस, आईपीएस बना दिया जाता है, जिससे समाज पीछे चला जाता है। आरक्षण प्रतिभाओं का दमन करता है, जिससे प्रतियोगी असफल होकर आत्महत्या जैसे जघन्य अपराध करने को विवश हो जाते हैं। आज राष्ट्रपति एसटी आदिवासी हैं। प्रधानमंत्री, गृहमंत्री सहित अनेक केंद्रीय मंत्री, कई प्रदेशों के मुख्य, उपमुख्यमंत्री, सांसद, विधायक आरक्षित श्रेणी के हैं। वे पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का फायदा उठाते चले आ रहे हैं, जिनके पास अपार दौलत, संपत्ति जमा हो चुकी है, फिर भी आरक्षण चाहिए उन्हें। सच तो यह है कि मात्र पांच प्रतिशत परिवार आरक्षण का आनंद लूट रहे हैं। कोई सांसद है, मंत्री है, तो उसके बेटे, बहू, बेटी को सांसद और विधायक ही बनाने का यत्न किया जाता है। कई-कई परिवार, राजनीति हो या सरकारी सेवा, आरक्षण का लाभ लेते आ रहे हैं, जबकि 95 प्रतिशत आरक्षित जातियों के परिवार उच्च शिक्षा प्राप्त ही नहीं कर पाते, तो आरक्षण कहां से पाएंगे। हर पद की अपनी मर्यादा, अपनी योग्यता होती है, लेकिन आरक्षण अयोग्य व्यक्तियों को सिर पर बिठा देता है। अब अगर कई दशकों तक आरक्षण की बैसाखी के सहारे जिन जातियों को आगे बढ़ाने की कोशिशें की जाती रहेंगी, तो फिर गुण, यानी पात्रता कहां से आएगी। बैसाखी, यानी आरक्षण, अपंग, श्रमहीन बनाता जा रहा है। आरक्षण से सरकारी नौकरियां भले मिल जाएं, ऊंची कुर्सी भले प्राप्त हो जाए, लेकिन प्रतिभा कहां से आएगी। आरक्षण के कारण ही देश की आर्थिक दृष्टि से सक्षम प्रतिभाएं विदेश पलायन को बाध्य होती हैं, जिनकी प्रतिभाओं का फायदा विदेश उठाकर उन्नति करता है, लेकिन भारत में आरक्षण के कारण प्रतिभाओं का अनादर होने के कारण ही भारत, अपने दो साल बाद आजाद होने वाले चीन के मुकाबले, कहीं भी नहीं ठहरता। विदेशों में हुनर, योग्यता देखी जाती है, जाति नहीं। भारत में जातिवाद का नारा वही लगाते हैं, जो जातीय प्रमाणपत्र बनवाकर सरकारी नौकरियां पाते हैं और फिर कहते हैं, जाति प्रथा ने देश बरबाद किया। फिर जातीय प्रमाणपत्र क्यों बनवाते हो। जब जाति प्रमाणपत्र बनवाने में तुम्हारा अपमान नहीं होता, तो फिर जाति कह देने से किसी को कानून सजा कैसे देता है। जातिवादी नेता कहते हैं, जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। बाबा जी का भंडारा है क्या। सवर्णों ने देश हित में बलिदान दिए और तुमने क्या किया। अंग्रेजी सेना में भर्ती होकर पेशवा के खिलाफ लड़ाई लड़े और फिर कहते हो, मूल निवासी हो। विदेशी भला क्यों देश के लिए शहीद होगा। देश हित में ही सरकार द्वारा “हम दो, हमारे दो” को अपनाया और नसबंदी करा ली, वरना सवर्ण भी कुत्तों की तरह दस-बारह बच्चे पैदा करते, तो आज अस्सी प्रतिशत आबादी सवर्णों की होती। जहां तक संख्या की बात है, तिलक, तराजू और तलवार वाले सवर्ण आज भी देश में 35 करोड़ हैं। सवर्णों ने ही देश हित में अपने राज्य भारतीय गणराज्य में सशर्त शामिल किए। अगर सरकार एससी, एसटी और यूजीसी लाकर सवर्णों से किए गए सरकारी वादे पूरे नहीं करती, तो सवर्णों को अधिकार है, वे भी सुलह पत्र नहीं मानें। अगर राजाओं के वारिसदार सरकार से अपने-अपने राज्य वापस ले लें, तो क्या बचेगा। अंग्रेजी सरकार ने आजादी की शर्त रखी थी, देश भर के राजा भारत या पाकिस्तान में शामिल होने के लिए स्वतंत्र हैं। विलय की शर्तें लिखित हैं, जुबानी नहीं। न्याय कहता है, आरक्षण खत्म करो और श्रम करके योग्यता हासिल करो, और फिर स्वस्थ प्रतियोगिता करो। जो हुनरमंद, ज्ञानी, मेधा-शक्ति वाला होगा, वही देश की सरकारी नौकरियों और राजनीति में उच्चासन पर विराजमान होगा।

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