Sunday, March 22, 2026
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मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई ने मुंबई दौरे पर जताई नाराजगी, कहा– संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान आवश्यक

मुंबई। सुप्रीम कोर्ट के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश भूषण गवई के सम्मान में रविवार को महाराष्ट्र एवं गोवा बार काउंसिल द्वारा आयोजित समारोह के दौरान एक असहज स्थिति तब उत्पन्न हुई जब उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के शीर्ष अधिकारियों की अनुपस्थिति पर सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ- न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका एक समान हैं, और एक-दूसरे के प्रति सम्मान अनिवार्य है। मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा, “अगर भारत का मुख्य न्यायाधीश पहली बार महाराष्ट्र के दौरे पर आता है और राज्य के मुख्य सचिव, डीजीपी और मुंबई पुलिस आयुक्त तक को यह उपस्थिति आवश्यक नहीं लगती, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। यह प्रोटोकॉल का सवाल नहीं है, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं के बीच सम्मान का विषय है।” उन्होंने यह भी कहा कि “जब कोई संवैधानिक संस्था पहली बार राज्य में आती है, तो उसके स्वागत की गरिमा पर विचार होना चाहिए। अगर हममें से कोई होता, तो अनुच्छेद 142 पर चर्चा होती।”
भावुक लहजे में दिए अपने संबोधन में मुख्य न्यायाधीश ने अपने जीवन के संघर्षों और उपलब्धियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि वे अमरावती जिले के एक नगरपालिका स्कूल से पढ़ाई कर यहां तक पहुंचे हैं। “जो कुछ भी हूं, वो मेरे माता-पिता की वजह से हूं,” उन्होंने कहा, और साथ ही डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों को अपने जीवन का आधार बताया। गवई ने बताया कि उनके पिता वकील बनना चाहते थे लेकिन वो सपना पूरा नहीं कर सके, और वही सपना उन्होंने अपने बेटे में देखा। “मैंने उनके अधूरे सपने को पूरा किया। उन्होंने बताया कि उनकी वकालत की शुरुआत राजाभाऊ से हुई, मुंबई में काम किया, फिर नागपुर गए। जब दस साल की प्रैक्टिस पूरी हुई, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख ने उन्हें सरकारी वकील नियुक्त किया, और वहीं से उनके न्यायिक सफर ने गति पकड़ी। उन्होंने आगे कहा कि “40 वर्ष की उम्र में मैंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, फिर वरिष्ठ अधिवक्ता बना। कई बार कठिनाइयां आईं, लेकिन हर बार रास्ता निकला।” उन्होंने यह भी स्मरण किया कि 2003 और 2019 के बीच अनुसूचित जाति और जनजातियों से कोई भी सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश नहीं था — जो इस सामाजिक प्रतिनिधित्व की गंभीर कमी को दर्शाता है। मुख्य न्यायाधीश ने नागपुर में अपने कुछ ऐतिहासिक फैसलों का उल्लेख किया, विशेषकर झुग्गी बस्तियों से संबंधित निर्णयों का जो वहां के गरीब तबकों के लिए महत्वपूर्ण साबित हुए। समारोह का समापन न्यायपालिका में विविधता, सामाजिक समरसता और आपसी सम्मान की आवश्यकता की पुनर्पुष्टि के साथ हुआ। मुख्य न्यायाधीश गवई की उपस्थिति और उनके स्पष्ट संदेश ने राज्य के प्रशासनिक और विधिक जगत में गंभीर सोच और मंथन की लहर उत्पन्न कर दी है।

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