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पुस्तक चर्चा: विभाजन की पीड़ा में मानवीय रिश्तों की मिठास: ‘रात्रि का दूसरा पहर’

सिद्दीक एहमद
भारतीय साहित्य में हिंदी के साथ अन्य भाषाएं भी शामिल हैं। प्रायः भारतीय भाषाओं का श्रेष्ठ लेखन हिंदी में अनुवादित कम ही होता है। सिंधी भाषा भले कम प्रचलित हो, लेकिन उसकी मिठास, उसका साहित्य, नाटक, उपन्यास आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने अन्य भाषाओं के। भारत के विभाजन के बाद सिंधी समाज सहित पाकिस्तान अर्थात पहले के अखंड भारत में रहने वाले अन्य समाजों के लोगों को भी अपनों के बिछड़ने का दर्द झेलना पड़ा। उस समय सिंध में रहने वाले सभी समाज के लोग ऐसे मिल-जुलकर रहते थे जैसे सगे-संबंधी हों। सिंधी भाषा के सबसे लोकप्रिय उपन्यास “रात्रि का दूसरा पहर” का हिंदी जगत में स्वागत होना चाहिए। चालीस साल पहले लिखा गया यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना भारत के विभाजन के समय था। इसे साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अजमेर के लेखक हरि हिमथानी ने लिखा था। भोपाल के अशोक मनवानी ने राष्ट्रीय सिंधी भाषा विकास परिषद, भारत सरकार के सहयोग से प्रकाशक ‘अखंड सिंधु संसार’, भोपाल से हिंदी में प्रकाशित किया है।
किसी भी भाषा के उपन्यास को दूसरी भाषा में अनुवादित करना उपन्यास लिखने से अधिक कठिन होता है। अनुवादक को मूल उपन्यास की गरिमा और उद्देश्य को बनाए रखते हुए ऐसा अनुवाद करना होता है जिससे पाठक को उसे समझने में आसानी हो। शब्दों का चयन, वाक्य-विन्यास के साथ इस बात का विशेष ध्यान रखना होता है कि सभी भाषाओं में तालमेल बना रहे। लेखक जो कहना चाह रहा है, वह सभी पाठकों तक पहुंच जाए।
उपन्यास “रात्रि का दूसरा पहर” देश के विभाजन की परिस्थितियों के बीच अंकुरित प्रेम संबंधों पर केंद्रित है। भारत-पाक में तब बहुत उथल-पुथल थी, पर प्रेम का तत्व कहीं विलुप्त नहीं हुआ था। आजाद तो दोनों देश हो गए थे, बंटवारा भी हो चुका था, परंतु इंसान नहीं बंट पाए थे। दोनों देशों से विस्थापित होकर नागरिक नए देश में बसने जा रहे थे। यह क्रम कुछ महीनों तक चला था। ऐसे हालात में भी प्रेम खत्म नहीं हुआ था। मानवीय जीवन में यह सदा रहेगा। इस उपन्यास का नायक द्वंद्व में रहता है। उसकी चाहत पहले एक थी, बाद में दो हो जाती हैं। नायक युवा एंशी अविवाहित है। उपन्यास में नायिकाएं दो हैं,पहली जुहरा, जो अविवाहित है। दूसरी नायिका रेमी विवाहित है।
रेमी, एंशी और जुहरा के प्रेम को सशक्त बनाने का माध्यम बनती है। लेकिन इस बीच एंशी का आकर्षण रेमी के प्रति भी हो जाता है। यहां तक कि रेमी अपने पति ओलाफ और एंशी के साथ मैत्री भाव से सहज रहती है। एंशी, रेमी को भी समान रूप से चाहने लगता है। बड़ी संख्या में सिंध से विस्थापित होकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के लिए एक दिन एंशी को भी कराची से पानी के जहाज में बैठकर परिजनों के साथ भारत रवाना होना पड़ता है।
अंतिम दिनों में वह रेमी से भेंट कर विदाई तो ले चुका था, लेकिन जुहरा से न मिल पाने का उसे अफसोस रहता है। बंटवारे से हर कोई विवश हो जाता है। सब अपने-अपने घर बसा लेते हैं। उपन्यास का नायक एंशी नई जमीन पर पहुंचकर अजमेर में बस जाता है। इसके 20-25 साल बाद दरगाह शरीफ के दर्शन के लिए जुहरा अपने पति, भाई-भाभी के साथ अजमेर पहुंचती है। यह परिवार संयोग से स्टेशन पर एंशी से मिल जाता है। एंशी उन्हें होटल के बजाय अपने घर रुकने का आग्रह करता है। अंततः जुहरा का परिवार एंशी की बात मान लेता है। वे आसपास के स्थान भी घूमते हैं। उनके बीच चुटकुलों और शायरी की महफिल भी जमती है।
उपन्यास के कथानक में बताया गया है कि धर्म से ऊपर आपसी मानवीय संबंध होते हैं। एक-दूसरे को सम्मान देना कितना महत्वपूर्ण है। निःस्वार्थ प्रेम के रिश्ते बहुत बड़े होते हैं। भले ही एंशी और जुहरा जीवनसाथी नहीं बन सके, लेकिन परिवारों का संगम भारतीय संस्कृति और भाईचारे का उदाहरण प्रस्तुत करता है। वे ऐसे सच के साक्षी थे, जिसके बारे में उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि फिर जीवन में मिल पाएंगे। संसार बहुत बड़ा नहीं है। जिस इंसान से लगाव हो, अगर उसका चेहरा भी दिख जाए तो उसका अपना आनंद होता है। सिर्फ दैहिक संबंध ऐसे रिश्तों का आधार नहीं होते। परस्पर अपेक्षा-रहित प्रेम कितना महत्वपूर्ण है, इसे बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया गया है। अशोक मनवानी उपन्यास की भावना को सभी पाठकों तक पहुंचाने में सफल रहे हैं। अपने कथानक और भाषा-शैली के कारण यह उपन्यास पाठकों को बांधे रखता है।

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