Wednesday, March 11, 2026
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने विशालगढ़ किले की दरगाह में बकरीद व उर्स के दौरान कुर्बानी की दी अनुमति, शर्तों का पालन अनिवार्य

मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार को कोल्हापुर स्थित विशालगढ़ किले के परिसर में हजरत पीर मलिक रेहान मीरा साहब दरगाह पर बकरीद (7 जून) और उर्स (8 से 12 जून) के अवसर पर पशु बलि की अनुमति दे दी है। न्यायमूर्ति नीला गोखले और फिरदौस पूनीवाला की अवकाशकालीन पीठ ने यह स्पष्ट किया कि यह अनुमति न केवल दरगाह ट्रस्ट को, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेने वाले श्रद्धालुओं को भी दी गई है, बशर्ते वे तय शर्तों का पालन करें। यह निर्णय दरगाह ट्रस्ट की उस याचिका पर सुनवाई के दौरान आया, जिसमें पुरातत्व उपनिदेशक के उस निर्देश को चुनौती दी गई थी, जिसमें महाराष्ट्र प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल एवं अवशेष अधिनियम का हवाला देते हुए किले में पशु वध पर प्रतिबंध लगाया गया था। ट्रस्ट ने तर्क दिया कि कुर्बानी की यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है और यह बलि किले से लगभग 1.4 किमी दूर स्थित एक निजी भूखंड (गेट नंबर 19) पर दी जाती है, न कि सार्वजनिक स्थान पर। इस मांस को तीर्थयात्रियों और आसपास के ग्रामीणों में बांटा जाता है। पीठ ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि 14 जून 2024 को कोर्ट की एक समन्वय पीठ ने इसी विषय पर पहले ही अनुमति दे दी थी और अब उसी आदेश की शर्तों को लागू करते हुए मौजूदा याचिका का भी निपटारा किया जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कुर्बानी केवल निजी, बंद परिसर में ही दी जा सकती है, खासतौर पर गेट नंबर 19, जो श्री मुबारक उस्मान मुजावर के निजी स्वामित्व में है। किसी भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुर्बानी की अनुमति नहीं होगी।
पीठ ने जोर देकर कहा, “यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि 14 जून, 2024 के आदेश में जो शर्तें निर्धारित की गई हैं, वे न केवल याचिकाकर्ता ट्रस्ट बल्कि दरगाह में आने वाले श्रद्धालुओं पर भी लागू होंगी। इन शर्तों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। याचिकाकर्ताओं की ओर से वकीलों सतीश तालेकर और माधवी अय्यपन ने अदालत को सूचित किया कि पुलिस शाम 5 बजे के बाद दरगाह में प्रवेश की अनुमति नहीं दे रही है। इस पर पीठ ने कहा कि यह एक प्रशासनिक मामला है, जिसे नियमित अदालत में उठाया जा सकता है। ज्ञात हो कि 2023 में दरगाह ट्रस्ट को पुरातत्व विभाग से एक पत्र प्राप्त हुआ था, जिसमें बलि पर रोक लगाई गई थी। अधिकारियों ने इसके समर्थन में हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के 1998 के एक फैसले का हवाला दिया था, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर पशु बलि को प्रतिबंधित किया गया था। हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट की मौजूदा अवकाश पीठ ने उस आदेश से इतर, निजी भूखंड पर निर्धारित शर्तों के साथ बलि की अनुमति दी है। यह आदेश धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है, जिसमें कानून और आस्था के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया गया है।

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