Saturday, March 21, 2026
Google search engine
HomeArchitectureआदिवासी तरपा कला को वैश्विक पहचान दिलाने वाले भिकल्या ढिंडा को मिलेगा...

आदिवासी तरपा कला को वैश्विक पहचान दिलाने वाले भिकल्या ढिंडा को मिलेगा पद्म श्री

पालघर। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर केंद्र सरकार ने वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कारों की घोषणा की है। इस सूची में महाराष्ट्र से चार प्रतिष्ठित हस्तियों को शामिल किया गया है। इनमें पालघर जिले के जव्हार तालुका के दूरदराज आदिवासी गांव वालवंडा के रहने वाले प्रसिद्ध तारपा वादक भिकल्या लाडक्या ढिंडा को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई है। यह सम्मान आदिवासी कला, संस्कृति और लोकसंगीत के संरक्षण व प्रसार में उनके आजीवन योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति है। पद्म पुरस्कार की घोषणा के बाद भिकल्या ढिंडा के परिवार और पूरे आदिवासी समुदाय में खुशी और गर्व का माहौल है। ईटीवी भारत से बातचीत में भिकल्या ढिंडा ने कहा कि उन्होंने जीवन भर आदिवासी संस्कृति को सहेजने और आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। उन्होंने कहा कि उनका परिवार आर्थिक रूप से भले ही साधारण रहा हो, लेकिन संस्कृति ने उन्हें पहचान दी और यही उनकी सबसे बड़ी संपत्ति है। भिकल्या लाडक्या ढिंडा पिछले 80 वर्षों से अधिक समय से पारंपरिक आदिवासी वाद्य यंत्र ‘तारपा’ के वादन से जुड़े हुए हैं। तारपा केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की आदिवासी विरासत, सामाजिक जीवन और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा है। ढिंडा ने इस लोक कला को गांवों और जंगलों की सीमाओं से बाहर निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया, जिससे आदिवासी संस्कृति को व्यापक पहचान मिली। भिकल्या ढिंडा ऐसे परिवार में जन्मे हैं, जहां लगभग 150 वर्षों से तारपा वादन की परंपरा चली आ रही है। उनके दादा नवसु धकलिया ढिंडा और पिता लाडकिया धकलिया ढिंडा अपने समय के जाने-माने तारपा वादक थे। इसी समृद्ध सांस्कृतिक वातावरण में पले-बढ़े भिकल्या का बचपन से ही तारपा से गहरा नाता जुड़ गया। औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद उन्होंने मात्र 12 वर्ष की उम्र में इस कला को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। आज 92 वर्ष की आयु में भी उनका उत्साह, साधना और समर्पण पहले जैसा ही है। वे आज भी तारपा को केवल संगीत का माध्यम नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और दिव्य शक्ति मानते हैं। लोक कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें वर्षों में सैकड़ों पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं, लेकिन पद्म श्री पुरस्कार की घोषणा ने न केवल उनके जीवन की साधना को नई ऊंचाई दी है, बल्कि पूरे आदिवासी समाज को गौरवान्वित किया है। सम्मान की घोषणा पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भिकल्या लाडक्या ढिंडा ने कहा कि तारपा उनके लिए जीवन का आधार और संस्कृति की आत्मा है। उन्होंने युवा पीढ़ी से अपील की कि वे इस समृद्ध आदिवासी परंपरा को सहेजें और आगे बढ़ाएं, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी रह सकें। भिकल्या लाडक्या ढिंडा को मिला पद्म श्री सम्मान न केवल एक कलाकार की व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा को जीवित रखने वाली आदिवासी कला, संगीत और परंपराओं की भी राष्ट्रीय स्तर पर सशक्त मान्यता है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments