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युवा आंदोलन के बाद बदला शिक्षा मंत्री, प्रल्हाद जोशी की नियुक्ति से छिड़ी नई सियासी बहस

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नई दिल्ली। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक महीने से अधिक समय तक चले युवा आंदोलन की बड़ी राजनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इस्तीफे के अगले ही दिन केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी वरिष्ठ भाजपा नेता प्रल्हाद जोशी को सौंप दी। इसके साथ ही सरकार की शिक्षा नीति की दिशा और नए मंत्री के पुराने बयानों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। धर्मेंद्र प्रधान और प्रल्हाद जोशी दोनों का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से पुराना जुड़ाव रहा है। ऐसे में जोशी को शिक्षा मंत्रालय सौंपे जाने के बाद विपक्ष और आंदोलन से जुड़े लोगों के बीच यह सवाल उठने लगा कि क्या मंत्री का चेहरा बदलने के बावजूद शिक्षा नीति के स्तर पर सरकार किसी बड़े बदलाव के लिए तैयार है। इसी बीच संसद के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रल्हाद जोशी पर गंभीर राजनीतिक आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने बिलकिस बानो मामले के दोषियों की समय से पहले रिहाई के फैसले का समर्थन किया था। इससे पहले कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने भी लोकसभा में इसी मुद्दे को उठाया था। उनकी टिप्पणी पर भाजपा नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई और संबंधित टिप्पणी को सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया। प्रल्हाद जोशी ने लोकसभा में आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि प्रियंका गांधी को अपने आरोप साबित करने चाहिए। उन्होंने कहा कि उनके बारे में गलत जानकारी दी जा रही है और बिना तथ्य के इस तरह के आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए। विवाद की जड़ वर्ष 2022 में बिलकिस बानो मामले के 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई से जुड़ी है। 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो से सामूहिक दुष्कर्म और उनके परिवार के सदस्यों की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 11 दोषियों को गुजरात सरकार की छूट नीति के तहत रिहा किया गया था। इस फैसले को लेकर देशभर में राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हुआ था। उस समय केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री रहे प्रल्हाद जोशी ने गुजरात सरकार के फैसले का बचाव किया था। अक्टूबर 2022 में एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि यदि सरकार और संबंधित अधिकारियों ने कानून के तहत फैसला लिया है तो उन्हें इसमें कुछ गलत नहीं दिखाई देता। उनका कहना था कि लंबे समय तक जेल में सजा काट चुके कैदियों के लिए कानून में समय से पहले रिहाई का प्रावधान है। जोशी ने उस समय यह भी कहा था कि अच्छे आचरण के आधार पर कैदियों की रिहाई का अधिकार राज्य सरकार के पास है और इस मामले को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि किसी भी अपराधी को उसके अपराध की सजा मिलनी चाहिए।
बिलकिस बानो मामले के दोषियों की रिहाई बाद में सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। जनवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार द्वारा 11 दोषियों को दी गई छूट को रद्द करते हुए उनकी रिहाई का फैसला निरस्त कर दिया था और दोषियों को वापस जेल भेजने का आदेश दिया था। अब प्रल्हाद जोशी को शिक्षा मंत्रालय दिए जाने के बाद यह पुराना विवाद फिर राजनीतिक चर्चा में आ गया है। विपक्ष उनके पुराने रुख को लेकर सवाल उठा रहा है, जबकि भाजपा की ओर से आरोपों का विरोध किया जा रहा है।
वहीं, शिक्षा मंत्रालय में नेतृत्व परिवर्तन को जंतर-मंतर पर चले आंदोलन के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। आंदोलन के दौरान NEET-UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को लेकर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग प्रमुखता से उठाई गई थी। उनके पद छोड़ने के बाद आंदोलन समर्थक इसे सरकार पर बने दबाव का परिणाम और अपनी प्रतीकात्मक जीत मान रहे हैं। इतिहासकार मुकुल केसवन ने इस घटनाक्रम को सरकार की नीति और आंदोलन की उपलब्धि, दोनों के नजरिए से देखा। उनका कहना है कि धर्मेंद्र प्रधान की जगह प्रल्हाद जोशी की नियुक्ति यह संकेत देती है कि सरकार शिक्षा नीति की मूल दिशा में बदलाव नहीं करना चाहती। उनके मुताबिक मंत्री का चेहरा बदला है, लेकिन इससे यह जरूरी नहीं कि सरकार की नीति भी बदल जाए। केसवन के अनुसार, आंदोलन की उपलब्धि को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि एक आरएसएस पृष्ठभूमि वाले नेता की जगह दूसरे ऐसे नेता को मंत्रालय मिला। उनका मानना है कि एक मजबूत सरकार पर दबाव बनाकर केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा हासिल करना अपने आप में प्रतीकात्मक राजनीतिक सफलता है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और प्रल्हाद जोशी की नियुक्ति के बाद अब असली निगाह इस बात पर रहेगी कि शिक्षा मंत्रालय NEET समेत परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और छात्रों की मांगों को लेकर क्या कदम उठाता है। नेतृत्व बदलने के बाद भी यदि नीतिगत स्तर पर बदलाव नहीं होता है तो छात्र आंदोलन और सरकार के बीच टकराव का मुद्दा आगे भी राजनीतिक बहस का केंद्र बना रह सकता है।

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