
इंद्र यादव/मुंबई। क्या किसी परीक्षा के अंक किसी छात्र की पूरी जिंदगी और उसकी काबिलियत का फैसला कर सकते हैं? महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले के कर्जत से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और विद्यार्थियों के मानसिक तनाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्जत के जलालपुर गांव की रहने वाली छात्रा अंकिता सांगले डॉक्टर बनने का सपना देख रही थी और इसके लिए उसने NEET की दोबारा परीक्षा दी थी। परीक्षा परिणाम में उसे 166 अंक मिले। बताया जा रहा है कि अपेक्षा के अनुरूप अंक नहीं मिलने के कारण वह काफी तनाव में थी।जानकारी के मुताबिक, रविवार शाम करीब 4:30 बजे अंकिता अपने घर के स्टडी रूम में मृत मिली। घटना की जानकारी मिलने के बाद कर्जत पुलिस मौके पर पहुंची और जांच शुरू की। परीक्षा से जुड़े तनाव का उल्लेख करने वाला एक सुसाइड नोट मिलने की बात भी सामने आई है, हालांकि पुलिस मामले के सभी पहलुओं की जांच कर रही है।
प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव बना गंभीर चिंता
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता को लेकर विद्यार्थियों पर बढ़ता दबाव कितना गंभीर होता जा रहा है। डॉक्टर या इंजीनियर बनने की अपेक्षाएं, बेहतर अंक हासिल करने की होड़ और असफलता का डर कई विद्यार्थियों के लिए भारी मानसिक दबाव का कारण बन सकता है। परीक्षा में मिले अंक किसी विद्यार्थी की पूरी क्षमता का पैमाना नहीं होते। परिवार, शिक्षकों और समाज की जिम्मेदारी है कि युवाओं को यह भरोसा दिया जाए कि किसी एक परीक्षा में अपेक्षित सफलता न मिलना जीवन की असफलता नहीं है। शिक्षा और करियर के अनेक रास्ते मौजूद हैं और कठिन समय में संवाद तथा समय पर सहायता बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। अंकिता की मौत ने विद्यार्थियों के लिए काउंसलिंग और भावनात्मक सहयोग की आवश्यकता को भी सामने रखा है। परीक्षा की तैयारी के साथ युवाओं को असफलता और तनाव से निपटने के लिए मजबूत सहायता व्यवस्था उपलब्ध कराना भी उतना ही जरूरी है। यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक तनाव, निराशा या खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे विचारों से जूझ रहा हो, तो परिवार या किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करने के साथ तत्काल पेशेवर सहायता लेना जरूरी है। भारत में सरकारी Tele-MANAS हेल्पलाइन 14416 के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्राप्त की जा सकती है।

