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केंद्र सरकार को बाल अपराधियों की आयु सीमा 18 से घटाकर 16 वर्ष करने का प्रस्ताव भेजेगी महाराष्ट्र सरकार

नाबालिगों से अपराध और नशे की तस्करी कराने वालों पर होगी सख्त कार्रवाई, कानून में संशोधन की तैयारी

मुंबई। महाराष्ट्र सरकार बाल अपराधियों की आयु सीमा 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजेगी। साथ ही नाबालिगों का इस्तेमाल अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी में करने वाले गिरोहों के खिलाफ और कड़ी कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कानून में आवश्यक संशोधन किए जाएंगे। मंगलवार को यह जानकारी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मंगलवार को विधानसभा में दी। जालना जिले में नाबालिगों के अपराध की ओर बढ़ते रुझान से जुड़े प्रश्न पर विधानसभा में चर्चा के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि लातूर की हालिया घटना व्यक्तिगत और पारिवारिक विवाद का परिणाम थी। मामले की जांच जारी है और जिन विधि-संघर्षरत बालकों की संलिप्तता सामने आई है, उन्हें किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष प्रस्तुत किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि मौजूदा कानून के तहत नाबालिगों को गिरफ्तार करने के बजाय बालगृह में रखने की व्यवस्था का कुछ आपराधिक तत्व दुरुपयोग कर रहे हैं। ऐसे लोग गंभीर अपराध करवाने और मादक पदार्थों के वितरण के लिए बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों द्वारा भी गंभीर अपराध किए जाने के मामले सामने आए हैं। फडणवीस ने कहा कि बाल अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति का वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित की जाएगी। इसके अलावा बच्चों का इस्तेमाल करने वाले गिरोहों और संगठित अपराध से जुड़े लोगों पर संगठित अपराध संबंधी कठोर धाराएं लगाने तथा संबंधित कानूनों को और प्रभावी बनाने पर भी विचार किया जा रहा है। चर्चा के दौरान एक उपप्रश्न के उत्तर में गृह राज्यमंत्री योगेश कदम ने कहा कि राज्य में बाल अपराध रोकने के लिए विभिन्न निवारक और पुनर्वासात्मक उपाय लागू किए जा रहे हैं। पुलिस स्कूलों और कॉलेजों में छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के लिए जागरूकता अभियान, काउंसिलिंग, साइबर सुरक्षा और नशामुक्ति से जुड़े कार्यक्रम चला रही है। संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित गश्त और विशेष कार्रवाई भी की जा रही है। उन्होंने बताया कि किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत सभी पुलिस इकाइयों में विशेष बाल इकाइयों का गठन किया गया है। इनके माध्यम से CARE (काउंसिलिंग एंड रिफॉर्मेटिव एजुकेशन) कार्यक्रम चलाकर विधि-संघर्षरत बच्चों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया जा रहा है। वहीं, निरीक्षण गृहों में ऐसे बच्चों के संरक्षण, शिक्षा, परामर्श, व्यक्तित्व विकास और पुनर्वास पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

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