
मुंबई। महाराष्ट्र विधानसभा में पारित जन सुरक्षा अधिनियम 2024 को लेकर विपक्षी दलों ने तीखा ऐतराज़ जताया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के विधायक और सदन में समूह नेता भास्कर जाधव ने सोमवार को कहा कि उन्होंने संयुक्त चयन समिति के अध्यक्ष राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले को इस विधेयक पर चार पृष्ठों का असहमति पत्र सौंपा था, जिसमें उन्होंने कानून के कई प्रावधानों को संविधान विरोधी बताया था, लेकिन समिति ने इन बिंदुओं पर कोई विचार नहीं किया। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समिति की रिपोर्ट पेश करते समय उनके संवैधानिक आपत्तियों को पढ़ा तक नहीं गया और न ही चर्चा के दौरान उन्हें शामिल किया गया। सरकार ने दावा किया था कि यह विधेयक सर्वसम्मति से पारित हुआ, हालांकि माकपा विधायक विनोद निकोल ने इसके खिलाफ मतदान किया। वहीं विधानसभा में विपक्ष की चुप्पी पर भी आलोचना हो रही है, जबकि विधान परिषद में विपक्षी दलों ने इस कानून के विरोध में सदन से वॉकआउट किया। भास्कर जाधव ने कहा कि जन सुरक्षा अधिनियम की धारा 2(एफ) संविधान के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन करती है क्योंकि यह नागरिकों के भाषण, लेखन, संदेश या कला के ज़रिए अभिव्यक्ति पर रोक लगाती है। इसी तरह धारा 2(डी) “संगठन” की परिभाषा को इतना व्यापक बनाती है कि यह अनुच्छेद 19(1)(सी) के तहत संघ बनाने के अधिकार को कमजोर कर सकती है। उन्होंने धारा 2(जी), 3(I) और 3(II) पर भी आपत्ति जताई जो सरकार को किसी भी संगठन या कार्य को “अवैध” घोषित करने की असीमित शक्ति देती हैं। जाधव ने आरोप लगाया कि यह अधिनियम नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर सीधा हमला है, जिससे सरकार को मनमाने तरीके से दमनकारी कार्रवाई करने का अधिकार मिल जाएगा। उन्होंने कहा कि इस कानून के तहत जनता की आवाज़, असहमति और अभिव्यक्ति को दबाया जाएगा। इस बीच महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एमपीसीसी) ने इस कानून के खिलाफ आंदोलन छेड़ने की घोषणा की है। पार्टी अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि कांग्रेस राज्य के हर जिले में इस विधेयक की प्रतियां प्रतीकात्मक रूप से जलाकर अपना विरोध दर्ज कराएगी। उन्होंने इसे भारतीय संविधान की आत्मा के खिलाफ बताते हुए कहा कि भाजपा सरकार लोकतांत्रिक विरोध को खत्म करने के लिए जन सुरक्षा कानून का दुरुपयोग करना चाहती है। विपक्ष का आरोप है कि यह कानून वामपंथी विचारधारा, आदिवासी आंदोलनों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और असहमति जताने वाले नागरिक समूहों को निशाना बनाने के इरादे से लाया गया है। विपक्ष के अनुसार यह अधिनियम “राज्य की सुरक्षा” की आड़ में जनता की आवाज़ को कुचलने का औजार बन सकता है। अब देखना यह है कि सरकार इस कानून के विरोध में उठ रही आवाज़ों को किस प्रकार जवाब देती है, क्योंकि आने वाले दिनों में यह मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति और नागरिक स्वतंत्रता की दिशा को गहराई से प्रभावित कर सकता है।




