
मुंबई। मुंबई के अणुशक्तिनगर से विधायक सना मलिक-शेख ने मुंबई के धर्मार्थ अस्पतालों में गरीब और वंचित मरीजों के लिए निर्धारित मुफ्त एवं सब्सिडी वाले बिस्तरों के दुरुपयोग का मुद्दा विधानसभा में ज़ोरदार ढंग से उठाया। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से बोलते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार से रियायती ज़मीन और कर छूट जैसी सुविधाएं लेने वाले इन अस्पतालों की जवाबदेही लगातार शिथिल हो रही है। उन्होंने इंडिया सीएसआर और विकास ग्लोबल चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा 2023-24 में किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े साझा किए, जिनमें यह सामने आया कि बीपीएल (गरीबी रेखा से नीचे) रोगियों के लिए 71 प्रतिशत और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 92 प्रतिशत बिस्तर आरक्षित हैं, जबकि आईपीएस कोटे के लिए मात्र 2 प्रतिशत। इसके बावजूद इन बिस्तरों का उपयोग वास्तविक ज़रूरतमंदों को नहीं मिल पा रहा है। एसएल रहेजा, ब्रीच कैंडी और मसिना अस्पतालों जैसे प्रतिष्ठानों के 95 प्रतिशत बिस्तर ईडब्ल्यूएस वर्ग के लिए नामांकित हैं, फिर भी आम गरीब मरीजों को दाखिला नहीं मिल पाता। मलिक-शेख ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस द्वारा 2024 में शुरू किए गए डिजिटल पोर्टल की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाया और मांग की कि इसकी सार्वजनिक पहुँच सुनिश्चित की जाए ताकि पारदर्शिता बढ़े। उन्होंने पूछा कि क्या यह पोर्टल वास्तविक समय में खाली बिस्तरों की जानकारी देगा और क्या अस्पतालों को बाहर सूचना पट लगाकर मुफ्त सेवाओं की जानकारी देने के लिए बाध्य किया जाएगा। साथ ही, उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि डिजिटल सुविधाओं से वंचित गरीब मरीजों को इन लाभों तक पहुँचाने के लिए सरकार क्या उपाय कर रही है। उन्होंने सरकार से अधिक पारदर्शिता, सख्त निगरानी, जन-जागरूकता अभियान और सार्वजनिक निगरानी तंत्र की मांग की ताकि धर्मार्थ अस्पतालों को उनके संवैधानिक और सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करने के लिए बाध्य किया जा सके। विधायक की इस पहल ने मुंबई और राज्य के अन्य हिस्सों में स्वास्थ्य सेवाओं की समानता, जवाबदेही और सुलभता को लेकर एक अहम बहस को जन्म दिया है।




