Wednesday, March 4, 2026
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मुंब्रा ट्रेन हादसे पर पूर्व जीएम सुबोध जैन की प्रतिक्रिया: आंतरिक भीड़ और बैगपैक से बढ़ा असंतुलन का खतरा

मुंबई। सोमवार सुबह मुंब्रा और दिवा स्टेशनों के बीच एक दर्दनाक हादसे में 13 यात्री चलती लोकल ट्रेन से गिर गए, जिससे मुंबई के उपनगरीय रेलवे नेटवर्क में सुरक्षा को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। हादसे के बाद यात्रियों और स्थानीय निवासियों में आक्रोश फैल गया है, जो लंबे समय से अपर्याप्त बुनियादी ढांचे, ट्रेनों की संख्या में कमी और भीड़ प्रबंधन की नाकामी को लेकर शिकायतें करते रहे हैं। रेलवे बोर्ड के पूर्व सदस्य (इंजीनियरिंग) और सेंट्रल रेलवे के पूर्व महाप्रबंधक सुबोध जैन ने इस हादसे पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “बेहद दुर्लभ” लेकिन व्यवस्था की गंभीर विफलता करार दिया है। उनके अनुसार यह घटना किसी बाहरी टक्कर या तकनीकी खराबी से नहीं, बल्कि भीड़भाड़ और आंतरिक धक्का-मुक्की के कारण हुई, जिसमें भारी बैग भी एक महत्वपूर्ण कारक बने। जैन ने बताया कि अत्यधिक भीड़ और खड़े यात्रियों के कंधों से लटकते बड़े बैगपैक अक्सर किनारे पर लटके यात्रियों से टकराते हैं, जिससे उनका संतुलन बिगड़ सकता है। उन्होंने कहा- बैगपैक दिखने में साधारण लगते हैं, लेकिन चलती ट्रेन में थोड़ा सा धक्का भी किसी को मौत के मुंह में धकेल सकता है। जैन के अनुसार जब दो भरी हुई लोकल ट्रेनें एक-दूसरे के पास से गुजरती हैं, तब शारीरिक संपर्क और असंतुलन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। खासकर उन यात्रियों के लिए जो ट्रेन के दरवाजे पर लटककर सफर करते हैं।
तकनीकी पहलू और बुनियादी ढांचे की खामियाँ
सुबोध जैन ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रैक की वक्रता भले ही हादसे में एक सहायक कारक हो, लेकिन यह मुख्य कारण नहीं था। उन्होंने बताया कि सामान्यतः मुंबई के उपनगरीय रेल मार्ग में दो पटरियों के बीच न्यूनतम दूरी 4.5 मीटर होती है। ट्रेन की चौड़ाई लगभग 3.66 मीटर है और झुकाव की स्वीकृत सीमा 150 मिमी होती है, जिससे एक सामान्य स्थिति में यात्रियों के लिए पर्याप्त अंतर रहता है। हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि कुछ संकीर्ण रेलखंड, जैसे मस्जिद से सीएसएमटी के बीच, जोखिम अधिक है, और इन क्षेत्रों में पहले से ही गति प्रतिबंध लागू हैं। जैन ने उपनगरीय नेटवर्क के विस्तार की धीमी गति पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पांचवीं और छठी लाइन जैसे प्रमुख बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट एक दशक से अधिक समय से अधर में लटके हुए हैं। इसकी वजह से भीड़ घटाने के उपाय नहीं हो सके हैं और यात्रियों की सुरक्षा खतरे में पड़ी हुई है। उपनगरीय नेटवर्क का विकास बुरी तरह ठप पड़ा है। यदि समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए, तो ऐसे हादसे बार-बार दोहराए जा सकते हैं।

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