
(रमाकांत पंत) पिथौरागढ़-टनकपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर सफर करते हुए जब कोई जिला मुख्यालय से करीब 11 से 14 किलोमीटर की दूरी तय करता है, तो वादियों की ठंडी हवाओं के बीच आस्था और रहस्य का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है। यह पावन दरबार है गुरना माता का, जिन्हें स्थानीय लोग और इतिहास पाषाण देवी के नाम से जानते हैं। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि इस दुर्गम पहाड़ी रास्ते की जीवन रेखा और पावन आदि कैलाश यात्रा पर जाने वाले सनातन यात्रियों के लिए अगाध आस्था का प्रमुख केंद्र भी है। हर वर्ष आदि कैलाश की कठिन यात्रा पर निकलने वाले श्रद्धालु इस मंदिर में रुककर माता का आशीर्वाद लेते हैं और सुरक्षित यात्रा की कामना करते हैं। इस मंदिर का इतिहास रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसों और एक चमत्कारी स्वप्न से जुड़ा है। बात साल 1950 की है, जब पिथौरागढ़ क्षेत्र को बाहरी दुनिया से जोड़ने के लिए इस पहाड़ी मार्ग पर यातायात की शुरुआत हुई थी। रास्ता नया और बेहद खतरनाक होने के कारण यह मार्ग हादसों का गढ़ बन गया था, जिसने मुसाफिरों के दिलों में खौफ पैदा कर दिया था। उस दौर में, इस सड़क के ठीक नीचे पाषाण देवी का एक बेहद छोटा स्वरूप स्थापित था। तभी साल 1952 के आसपास मंदिर के मुख्य पुजारी को एक रात साक्षात माता ने सपने में दर्शन दिए और कहा कि मुझे इस खाई के नीचे से निकालकर सड़क के किनारे स्थापित करो ताकि मैं यहाँ बैठकर अपने भक्तों को आशीष दे सकूँ और इस मार्ग को सुरक्षित कर सकूँ। पुजारी ने बिना देर किए ग्रामीणों की मदद से माता की स्थापना राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे कर दी, जिसके बाद मार्ग पर होने वाले खौफनाक हादसों का सिलसिला हमेशा के लिए थम गया। गुरना गाँव के पास होने के कारण गुरना माता के रूप में प्रसिद्ध यह देवालय स्थानीय 11 गाँवों की कुलदेवी इग्यार देवी और माता वैष्णवी को समर्पित है, जिन्हें महादेव शिव की अर्धांगिनी माता पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। कुमाऊं में इस दरबार की मान्यता जम्मू-कश्मीर की विख्यात वैष्णो देवी के समान ही है, जहाँ सच्चे दिल से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है और महिलाओं को अखंड सौभाग्य व भक्तों को आरोग्य मिलता है। सदियों से चली आ रही परंपरा के अनुसार पास के बांस गांव के भट्ट जाति के पुरोहित यहाँ विधिवत पाठ-पूजा संपन्न कराते हैं और पांडे जाति के पंडित मंदिर की समस्त व्यवस्थाओं का संचालन करते हैं। मंदिर के पास स्थित ठंडे पानी के प्राकृतिक चश्मे के जल को भक्त प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसके साथ ही यहाँ के होटलों में मिलने वाले लजीज आलू के गुटके और पहाड़ी रायते का स्वाद आज भी हर यात्री की जुबान पर जिंदा है।

