
रायगढ़। सरकारी कुर्सी पर बैठकर अगर कोई यह समझ बैठे कि सरकारी टैक्स के साथ अपना ‘विशेष सेवा शुल्क’ भी वसूला जा सकता है, तो रायगढ़ से आई यह खबर उसके लिए चेतावनी है। सीबीआई ने कथित तौर पर 40 लाख रुपये की रिश्वत के मामले में CGST के अतिरिक्त आयुक्त विनय कुमार कांथेती, अधीक्षक राकेश कुमार सिन्हा और कथित बिचौलिए नरेंद्र राजपूत को गिरफ्तार किया है। आरोप गंभीर हैं और रकम भी ऐसी कि आम आदमी सुनकर पहले शून्य गिने और फिर सिर पकड़ ले। मामले में गिरफ्तार विनय कुमार कांथेती वरिष्ठ अधिकारी हैं, जबकि राकेश कुमार सिन्हा CGST में अधीक्षक बताए गए हैं। तीसरा आरोपी नरेंद्र राजपूत कथित तौर पर बिचौलिए की भूमिका में था। सीबीआई की कार्रवाई के बाद अब जांच एजेंसी इस पूरे कथित लेन-देन की कड़ियां खंगाल रही है। 40 लाख रुपये कोई मामूली रकम नहीं है। इतने बड़े कथित रिश्वत सौदे में बिचौलिए की भूमिका सामने आने से सवाल यह भी उठता है कि आखिर सरकारी कार्यालयों में ऐसे ‘पैसे के पुल’ कैसे खड़े हो जाते हैं? आम आदमी सरकारी दफ्तर में अपना वैध काम कराने पहुंचता है, लेकिन यदि उसके सामने नियम-कायदों के अतिरिक्त कोई दूसरी कीमत रखी जाए तो व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। कथित तौर पर रिश्वत का मामला आगे बढ़ रहा था, लेकिन सीबीआई की एंट्री ने पूरा हिसाब बिगाड़ दिया। जिन लोगों ने शायद सोचा होगा कि मामला आराम से निपट जाएगा, उनके लिए जांच एजेंसी की कार्रवाई किसी ‘सरप्राइज इंस्पेक्शन’ से कम नहीं रही। फर्क सिर्फ इतना था कि इस निरीक्षण में फाइलों के साथ गिरफ्तारी भी सामने आ गई। अतिरिक्त आयुक्त की गिरफ्तारी ने मामले को और गंभीर बना दिया है। आखिर ‘अतिरिक्त’ शब्द पद के साथ अच्छा लगता है, कमाई के साथ नहीं। सरकारी अधिकारी का अधिकार जितना बड़ा होता है, उससे ईमानदारी और जवाबदेही की अपेक्षा भी उतनी ही अधिक होती है। ऐसे में यदि उसी स्तर के अधिकारी पर रिश्वत लेने का आरोप लगे तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की साख पर उठता है। वहीं कथित बिचौलिए की गिरफ्तारी भी इस बात की ओर इशारा करती है कि रिश्वतखोरी के मामलों में अक्सर पैसे देने और लेने वालों के बीच तीसरा किरदार भी सक्रिय रहता है। यह ‘मध्यस्थ व्यवस्था’ सरकारी नियमावली में भले न हो, लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में बार-बार इसका नाम सामने आता रहा है। फिलहाल तीनों आरोपी सीबीआई की गिरफ्त में हैं और आरोपों की अंतिम सच्चाई न्यायिक प्रक्रिया में तय होगी। लेकिन इस कार्रवाई ने सरकारी महकमों में बैठे उन लोगों को जरूर संदेश दिया है जो कुर्सी को कमाई का जरिया समझ बैठते हैं—सरकारी वेतन के ऊपर ‘स्पेशल सर्विस चार्ज’ लेने की कोशिश महंगी पड़ सकती है, क्योंकि अगली दस्तक फरियादी की नहीं, जांच एजेंसी की भी हो सकती है।

