
आर.सूर्य कुमारी
कुछ पार्टियां चुनाव से पहले वोटों को खरीदने के लिए नोटों का इस्तेमाल करती हैं। पांच सौ से कम की बात तो चलती नहीं। घर में जितने वयस्क सद्स्य हैं, उतने पांच सौ के पत्ते आते हैं। वे एक वोट के बदले पांच सौ रुपए पाकर खुश हो जाते हैं। मानों जिंदगी भर के लिए बहुत बड़ा खजाना मिल गया हो। बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल हो गई हो। जब कि पैसे जैसे आते हैं वैसे चले भी जाते हैं। सप्ताह भर में सारे पैसे हाथों से रफूचक्कर हो जाते हैं। सच पूछा जाए तो वोटों को बेचना सिर्फ़ कानूनी अपराध ही नहीं, अपितु नैतिक दृष्टि से भी गलत है, मानवता पर भी करारा प्रहार है। यह अत्यंत दरिद्रता का भी सूचक है। रोटी-मिर्च-प्याज खाकर जिंदा रहने वाला यदि ईमानदारी से मतदान करता है, तो वास्तव में वह सबसे बड़ा धनी हैं, क्यों कि उसने देश के प्रति ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाई है, पार्टियों को ठेंगा दिखाया है।
ऊंची-ऊंची पढ़ाई करने वाले और तगड़ी कमाई करने वाले भी नोट लेकर वोट देते देखें जा सकते हैं । मानों मिट्टी में छुपा शंख खुद को गरीब बताकर ही छुप जाता हो। आश्चर्य की बात है कि चुनावों से पहले न जाने कहां से कुछ पार्टियां ढ़ेरों नोट लाकर अपने विश्वसनीय कार्यकर्ताओं के माध्यम से बंटवाती हैं । पता नहीं क्यों पुलिस को भनक नहीं लगती और क्यों वह धरपकड़ नहीं करती। वह तब ही कार्रवाई करती है जब पानी सर से बहने लगता है। हम एक स्वस्थ और स्वतंत्र लोकतंत्र हैं,ऐसी स्थिति में यदि कोई अपना वोट बेचता है तो यह सरासर राष्ट्र द्रोह है। अपने वोट का इस्तेमाल सही-सही और सोच -समझकर, तार्किक बनकर ही करना चाहिए। और हां पव्वे के लालच में भी मत पड़िए। शराब आपको मार सकती है,साथ ही यह आपके मान-मर्यादा को भी नष्ट कर देती है। हाल में बंगाल, असम, केरल, पुडुचेरी जैसे राज्यों में चुनाव होने हैं तब हमारी पुलिस को भी ध्यान देना चाहिए और व्यक्ति वह चाहे किसी भी पार्टी का हो, वोट खरीद – फरोख्त करता हो तो उस पर कानूनी कार्रवाई करें। ताकि यहां स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव हो सकें।




