
मुंबई (इंद्र यादव)। भारत की तेज़ आर्थिक प्रगति और वैश्विक मंच पर बढ़ती प्रतिष्ठा के बीच एक चिंताजनक रुझान भी सामने आ रहा है—उच्च आय वर्ग (HNIs), प्रतिभाशाली युवाओं और निवेशकों का विदेशों की ओर बढ़ता पलायन। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक बल्कि संस्थागत भरोसे पर भी सवाल खड़े कर रही है। पिछले एक दशक में बड़ी संख्या में भारतीयों ने विदेशी नागरिकता अपनाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर व्यापारिक माहौल, स्थिर नीतियां, कम कर संरचना और पारदर्शी प्रशासन जैसे कारणों से लोग दुबई, सिंगापुर और यूरोप जैसे देशों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। वहीं, वित्तीय घोटालों और बड़े आर्थिक अपराधों के मामलों ने भी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डाला है। विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे मामलों ने बैंकिंग प्रणाली और नियामकीय ढांचे को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। युवाओं के बीच भी असंतोष देखने को मिल रहा है। विभिन्न राज्यों में भर्ती परीक्षाओं से जुड़े पेपर लीक के मामलों ने मेहनती अभ्यर्थियों के भविष्य को प्रभावित किया है। इससे सरकारी नौकरियों की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इसी के साथ, आम नागरिकों के बीच बढ़ती महंगाई, सेवाओं की गुणवत्ता और नई तकनीकी व्यवस्थाओं (जैसे स्मार्ट मीटर) को लेकर भी असंतोष है। लोगों का कहना है कि जहां बुनियादी सुविधाओं में सुधार की जरूरत है, वहीं राजस्व वसूली की प्रक्रिया अधिक सख्त होती जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता, न्यायिक प्रक्रिया में तेजी और निवेश के अनुकूल माहौल बनाना जरूरी है। जब तक नागरिकों को समान अवसर, सुरक्षा और भरोसेमंद व्यवस्था नहीं मिलेगी, तब तक पलायन की यह प्रवृत्ति चुनौती बनी रह सकती है।




