
मुंबई। बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक मुस्लिम व्यक्ति और उसके माता-पिता के खिलाफ उसकी पत्नी की शिकायत पर दर्ज प्राथमिकी को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के तहत केवल तत्काल और अपरिवर्तनीय तलाक जैसे ‘तलाक-ए-बिद्दत’ को ही अपराध माना गया है, पारंपरिक ‘तलाक-ए-अहसन’ को नहीं। जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और संजय देशमुख की पीठ ने कहा कि अधिनियम में ‘तलाक’ की परिभाषा उन रूपों तक सीमित है जो तुरंत प्रभावी होते हैं, जबकि ‘तलाक-ए-अहसन’ में 90 दिन की इद्दत अवधि दी जाती है, जिसके दौरान दंपति पुनः साथ रह सकते हैं। चूंकि पति ने गवाहों की उपस्थिति में दिसंबर 2023 में पत्नी को तलाक-ए-अहसन कहा था और 90 दिन के भीतर साथ नहीं लौटे, इसलिए यह तलाक वैध माना गया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामले में एफआईआर दर्ज करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और सास-ससुर को इसमें घसीटना भी अनुचित है, क्योंकि यह मामला केवल पति से संबंधित है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल तीन तलाक प्रतिबंधित है, न कि तलाक के सभी रूप, और यदि कोई व्यक्ति वैध रूप से तलाक देता है तो उसे दंडित नहीं किया जा सकता।




