Saturday, March 14, 2026
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यूपी में सिविल विवादों को आपराधिक मामलों में बदलने की प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट नाराज


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश सरकार की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि राज्य में कानून का शासन पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के वी विश्वनाथन शामिल थे, ने यह टिप्पणी एक सिविल विवाद को आपराधिक मामले में बदलने के संदर्भ में की। पीठ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट इस प्रकार के प्रयासों को स्वीकार नहीं करेगा और कहा, “सिर्फ इसलिए कि दीवानी मामलों में लंबा समय लगता है, आप एफआईआर दर्ज कर आपराधिक कानून लागू कर देंगे?” सीजेआई ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यशैली को “गलत” बताते हुए कहा कि राज्य में हर रोज सिविल मामलों को आपराधिक मामलों में बदला जा रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि “केवल पैसा न देना अपराध नहीं बनाया जा सकता” और निर्देश दिया कि जांच अधिकारी (IO) खुद निचली अदालत में गवाह के कठघरे में आकर जवाब दें कि एफआईआर दर्ज करना क्यों जरूरी था। साथ ही, कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गौतमबुद्ध नगर के एसएचओ से हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने को कहा कि दीवानी विवाद में आपराधिक धाराएं क्यों लगाई गईं। यह टिप्पणी वकील चांद कुरैशी के माध्यम से देबू सिंह और दीपक सिंह की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिन्होंने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ आपराधिक मामला रद्द न करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नोएडा की ट्रायल कोर्ट में उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगा दी है, हालांकि चेक बाउंस का मामला जारी रहेगा। उल्लेखनीय है कि दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ नोएडा सेक्टर-39 पुलिस थाने में IPC की धारा 406, 506 और 120बी के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

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