Thursday, March 12, 2026
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बारहमासी जल व्यवस्था के लिए झरनों के संरक्षण पर बनेगी राज्य नीति: गणेश पाटील

मुंबई। स्वच्छ, सुरक्षित और शाश्वत बारहमासी जल व्यवस्था के लिए झरने प्राकृतिक जल स्रोत हैं, लेकिन प्राकृतिक और मानव-निर्मित कारणों से राज्य के अनेक झरने सूखते जा रहे हैं। दूसरी ओर पानी की मांग लगातार बढ़ रही है। इस पृष्ठभूमि में झरनों के पुनर्भरण और संरक्षण के लिए महाराष्ट्र सरकार का मृदा एवं जलसंधारण विभाग शीघ्र ही एक समग्र नीति तय करेगा, यह जानकारी मृदा एवं जलसंधारण विभाग के सचिव गणेश पाटील ने दी। वसुंधरा वॉटरशेड डेवलपमेंट एजेंसी और ग्रामपरी के संयुक्त तत्वावधान में पाचगणी में आयोजित “झरनों का प्रबंधन” विषय पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में वे मार्गदर्शन कर रहे थे। इस कार्यक्रम में वसुंधरा वॉटरशेड डेवलपमेंट एजेंसी, पुणे के साथ-साथ पुणे, सातारा, कोल्हापुर, रायगढ़, सिंधुदुर्ग, रत्नागिरी, अहिल्यानगर, नाशिक और नंदुरबार जिलों के अधिकारी सहभागी हुए। सचिव गणेश पाटील ने कहा कि झरनों के पुनर्जीवन और संरक्षण के लिए समर्पित प्रयासों की आवश्यकता है। यह एक नया और महत्वपूर्ण विषय है, इसलिए अधिकारी इसमें विशेषज्ञता हासिल करें और प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण के लिए बड़े पैमाने पर जनजागरूकता फैलाएं। इस अवसर पर एक्वाडैम के निदेशक डॉ. हिमांशु कुलकर्णी ने महाराष्ट्र में झरनों के पुनर्जीवन की नीति पर विस्तृत मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि झरने भूजल का सबसे प्राचीन और पर्यावरण-अनुकूल स्रोत हैं, इसलिए इनके संरक्षण पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। इसके लिए शासन, इस क्षेत्र में कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाएं, विशेषज्ञ, नाबार्ड और ग्रामवासियों के संयुक्त प्रयास जरूरी हैं। वसुंधरा वॉटरशेड डेवलपमेंट एजेंसी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कमलाकर रणदिवे ने कहा कि झरने स्वच्छ और शाश्वत जल के प्राकृतिक स्रोत हैं, जिनका संरक्षण शासन और प्रशासन के साथ-साथ समाज की भी सामूहिक जिम्मेदारी है। प्रशिक्षण के अंतर्गत प्रतिभागियों को सातारा जिले के जावली तालुका स्थित रानगेघर गांव के तामकड़ा झरने का “ट्रांजिट वॉक” कराया गया। इसमें झरने के उद्गम स्थल से लेकर जल प्रवाह तक की संपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रिया, भूगर्भीय संरचना, जल गुणवत्ता, जलसंधारण कार्य, मानवीय हस्तक्षेप और संरक्षण उपायों का प्रत्यक्ष अध्ययन किया गया। तीन दिवसीय इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से 50 मास्टर ट्रेनर्स तैयार किए गए हैं, जो भविष्य में महाराष्ट्र में झरनों से संबंधित नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे।

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