
मुंबई। ठाणे स्थित श्री गणेश मूर्तिकार उत्कर्ष संस्था ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के उन दिशा-निर्देशों को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है, जिसमें प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी मूर्तियों के निर्माण, बिक्री और विसर्जन पर रोक लगाई गई है। संस्था का कहना है कि ये प्रतिबंध उसके सदस्यों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं। सीपीसीबी ने मूर्ति निर्माण में केवल बायोडिग्रेडेबल, पर्यावरण के अनुकूल सामग्री के उपयोग को अनिवार्य कर दिया था। मुख्य न्यायाधीश आलोक अराधे और न्यायमूर्ति एमएस कार्णिक की खंडपीठ ने एसोसिएशन को अपनी याचिका में संशोधन करने और भारत संघ को प्रतिवादी के रूप में शामिल करने का निर्देश दिया।
इससे पहले 30 जनवरी को हाईकोर्ट ने नगर निकायों को पीओपी की मूर्तियों की बिक्री, निर्माण और विसर्जन पर प्रतिबंध सख्ती से लागू करने का आदेश दिया था। कोर्ट ने बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) और अन्य नगर निगमों को 12 मई, 2020 को जारी सीपीसीबी के दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। मूर्तिकारों के वकील संजीव गोरवाडकर ने दलील दी कि सीपीसीबी के दिशा-निर्देश बाध्यकारी नहीं हैं और उन्हें कानून के रूप में नहीं माना जा सकता। उन्होंने इसे अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।
हालांकि, खंडपीठ ने 2021 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश का हवाला दिया, जिसमें इन दिशा-निर्देशों को वैध ठहराया गया था, साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनजीटी के फैसले के खिलाफ याचिका खारिज करने की बात भी कही। मद्रास हाईकोर्ट के 2023 के आदेश का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि किसी को भी पीओपी से मूर्तियां बनाने का अधिकार नहीं है। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, बॉम्बे हाईकोर्ट ने मामले की आगे की सुनवाई के लिए 23 अप्रैल की तारीख तय की है।




