
विवेक रंजन श्रीवास्तव
सृष्टि के प्रारंभ में विधाता ने मनुष्य बनाया था, लेकिन इस डिजिटल कलयुग में मार्क जुकरबर्ग ने फेसबुकिया मनुष्य का मुखपोथी आविष्कार कर दिया। इसके साथ ही अवतरित हुआ एक नया वैश्विक संताप, डिजिटल आत्म-पीड़न। इस नए युग का मूल मंत्र बेहद अनूठा है, जहाँ लोग दूसरों की खुशियों की रंगीनियों से इस तरह आहत हो रहे हैं मानो किसी ने उनके अपने ही घर की बिजली काट दी हो। आहत होने का फैशन है, आस्था पर तो प्रहार , मानहानि के मुकदमों की भरमार है। स्थिति यह है कि जिनकी रचनात्मक क्षमता सीमित है वे केवल अपनी खुद की फेसबुक दीवार पर फ्लाइंग फ्रॉम अमुक जगह टू तमुक जगह के गूगल मैप का स्क्रीनशॉट पोस्ट करते हैं, तो कई परम ज्ञानियों के सीने पर सीधे हवाई जहाज लैंड कर जाता है। वे भूल जाते हैं कि पोस्ट करने वाले का मकसद किसी को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि अपनी यादों के डिजिटल शोरूम में स्वयं की विविधता को बतौर डिजिटल डायरी समेटना है। ताकि भविष्य में जब वे कोई यात्रा-संस्मरण या ट्रैवलॉग लिखें, तो संदर्भ सुरक्षित रहें। वे किसी को टैग भी नहीं कर रहे होते, फिर भी ईर्ष्या की भट्टी में खुद को झोंकने वाले स्वैच्छिक रूप से कुढ़ने का असीम सुख ढूंढ ही लेते हैं। यदि कोई यह नहीं भी लिखेगा कि वह कहां से क्या लिख रहा है तो उससे आपकी सेहत बनने या बिगड़ने वाली नहीं होती। लोगों की खुशियों में शामिल होना ही वैश्विकता है। विश्व कप फुटबॉल के लम्हे तो जीने वाले जीते ही रहेंगे, लाइव स्टेडियम में बैठकर, ऐसे लोग मैच देखें या न देखें। लोग तो अपनी थाली के भोजन से लेकर अपने रहन-सहन का कैनवास वैश्विक कर रहे हैं, जिससे अगर चश्मा बदलकर देखा जाए तो बहुत कुछ सीखा जा सकता है, मगर यहाँ तो समस्या यह है कि सामने वाले की थाली का पनीर आँखों में कंकड़ की तरह चुभ रहा होता है। ये वे ही कुंठित मनोवृत्ति के लोग होते हैं, जो महिलाओं पर व्यक्ति परक कविताएं लिखकर उनकी चरण वंदना करने के दैवीय सुख पाने की चेष्टा में फेसबुक का इस्तेमाल करने से नहीं चूकते या सुंदर महिलाओं की फोटो देख, अपने सफेद बालों की परवाह किए बिना,उनके इनबॉक्स में अनाधिकार मैसेज कर उनकी निजता में दखल के लिए फटकारे जाने में गर्व की अनुभूति करते हैं। इस आत्म-पीड़न का सबसे मजेदार पहलू यह है कि फेसबुक ने इस भारी कष्ट से मुक्ति के लिए अनफ्रेंड, अनफॉलो और ब्लॉक जैसे परम दिव्य और सहज ब्रह्मास्त्र मुफ्त में दे रखे हैं। छुओ और मुक्त हो जाओ! पर नहीं, रील भी पूरी देखनी है, पोस्ट पर खोजी नजर भी गड़ाए रखनी है और फिर कढ़ाई के तेल की तरह खौलना भी पूरा है। दुनिया में अरबों लोग रोज न जाने क्या-क्या अद्भुत कर रहे हैं, अब अगर तुम्हारी मुख-पोथी का कोई परिचित भी अपने बल पर या अपने बच्चों के बल से जिंदगी थोड़ी शिद्दत से जी रहा है, तो उससे कलेजा सुलगाने की क्या तुक? इस कूपमंडूकता का एक और नया और डरावना रूप तब देखने को मिलता है जब बात एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के रचनात्मक प्रयोग पर आती है। तकनीक के नाम पर केवल व्हाट्सएप फॉरवर्ड और गुड मॉर्निंग इमेज भेजने वाली जमात उन रचनाकारों से घोर ईर्ष्या कर रही है जो एआई का गुणवत्तापूर्ण उपयोग कर समकालीन लेखन और कला को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहे हैं। समय के साथ नवाचार को अपनाना ही हमेशा से प्रगति का पैमाना रहा है, वरना रूढ़िवादी सोच के साथ तो हम आज भी ताड़-पत्र और मोरपंख लेकर स्याही सुखा रहे होते।
आज एआई के साथ कदमताल मिलाकर उत्कृष्ट और प्रासंगिक लिखना लेखन की एक आधुनिक कला है जिसे पूरी दुनिया सलाम कर रही है, मगर कूपमंडूक इसे मानने को तैयार नहीं क्योंकि वे खुद इस रेस में पीछे छूट चुके हैं। डिजिटल युग में दूसरों की खुशियों और हुनर को अपनी जलन का बैकग्राउंड म्यूजिक बनाने के बजाय, खुद के कैनवास को बड़ा करना ही बुद्धिमानी है वरना फेसबुक की इस रंगीन दुनिया में लोग तो लाइव आते रहेंगे और जलने वाले सिर्फ राख होते रहेंगे। इस प्रवृति पर बुंदेलखंड में लोकोक्ति है,सूप तो सूप,छलनी बोले जिसमें बहत्तर छेद। मेरा तो कहना यही है कि बजाय प्रत्युत्तर देने के कैनवास वैश्विक कीजिए और दुनिया का सकारात्मक आनंद फेसबुक सर्फिंग से लीजिए और मंद मंद मुस्कुराइये।



