Wednesday, March 18, 2026
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व्यंग्य: अभी तो दिल्ली दूर है

विवेक रंजन श्रीवास्तव
मैंने दिल्ली जाने का प्लान बनाया तो मित्र ने कहा अरे ‘दिल्ली तो बस एक ट्रेन टिकट दूर है!’ परिवार वालों ने स्वास्थ्य, सामान और सुरक्षा की सलाहों का अम्बार लगा दिया। ‘रात की ट्रेन लेना, सीट मिल जाएगी,’ ‘नहीं, सुबह की शताब्दी एक्सप्रेस में एसी से जाओ, वरना दिल्ली पहुँचते-पहुँचते भुर्ता बन जाओगे।’ अंतत: मैंने विकल्प चुना, गरीबों का रथ यानी स्लीपर क्लास में एसी। ट्रेन का नाम था ‘आशा एक्सप्रेस’। दिल्ली से सारे देश को आशा होती ही है।
यात्रा का अर्थ होता है, जहाँ ‘स्वच्छ भारत’ का सपना धूल चाटता नजर है, ट्रेन के भीतर भी और खिड़की से झांको तो बाहर भी। ट्रेन में प्रवेश करते ही एक खास गंध ने स्वागत किया नमकीन, पसीना, और डिब्बे के नीचे लटकते कूड़े की अजीब सी गंध। मेरी बर्थ के बाजू में एक बुजुर्ग सज्जन सो रहे थे, उनकी खर्राटों की लय ट्रेन की आवाज़ की लय ताल में चल रही थी। पास वाली सीट पर बैठे युवक ने मोबाइल पर रील्स चला रखी थी, जिनके निर्माता निर्देशक कलाकार सब लोग स्वयं होते हैं। बीच-बीच में चायवाला चिल्लाता निकलता ‘गरमा-गरम चाय!’ मगर चाय ऐसी कि पीते ही पेट में कुछ कुछ होने लगे। दिल्ली स्टेशन पर उतरते ही एक ऑटोवाले ने लपकना चाहा, गूगल मैप्स ने बताया कि जिस होटल में मैंने अग्रिम आरक्षण करवा रखा वह सिर्फ 2 किमी दूर है। ऑटोवाले से कहा तो उसका भाड़ा सुनकर लगा, शायद उन्होंने ‘दिल्ली’ को ‘दुबई’ समझ लिया है, बहुत नखरे के बाद वह मीटर से चलने पर राजी हुआ। रास्ते भर उसने राजनीति, प्रदूषण, और बाढ़ के बारे में बौद्धिक भाषण दिया। मैं दाद दे रहा था, यहाँ के लोगों के ज्ञान और धैर्य की।
खैर हम होटल पहुंचे। ओयो होटल था, जिसका अर्थ युवा पीढ़ी कुछ और ही लगाने लगी है।
दूसरे दिन दिल्ली घूमने निकले, लाल किले के बाहर ‘सेल्फी स्टिक’ लिए लोगों की भीड़ देखकर विचार आया, यदि शहंशाह अकबर के समय फेसबुक होता तो यहीं से फेसबुक लाइव चलाया जाता। मजे की बात यह थी कि लाल किले का दिल्ली गेट बंद था और लाहौरी गेट चालू था, उसी से अंदर पहुँचे तो एक थका हुआ सुरक्षाकर्मी स्टूल पर खर्राटे लेता मिला।
कुतुब मीनार पर जाकर पता चला कि टिकट की कीमत और लोगों की धक्का-मुक्की, दोनों ‘ऊँचाई’ के मुकाम पर हैं। एक युवती अपने बॉयफ्रेंड से झगड़ा कर रही थी ‘तूने मेरी फोटो में मीनार काट दिया!’ दिल वालों की दिल्ली के प्रेमी भी ‘कट-ऑफ’ के मामले में एक्सपर्ट लगे ।
गांधी की समाधि गया तो सोचता रह गया कि अब यह विदेशी मेहमानों को घुमाने और शपथ ग्रहण के बाद मीडिया कवरेज के लिए चक्कर लगाने के काम की रह गई, लगती है। गांधी को सजिल्द पुस्तकों के पाठों में कैद कर दिया गया है और सफेद खादी की आड़ में काले धंधे चल रहे हैं।
जंतर मंतर वेधशाला न रहकर विरोध प्रदर्शन का स्थल बन चुका है। आंदोलन इतने बड़े हो चुके हैं कि वे यहां भी समा नहीं पाते और शाहीन बाग की सड़क हो या दिल्ली हरियाणा बार्डर, सड़क को अपने पिताजी की संपत्ति मानकर गलत सही हक की लड़ाई का साधन बना लिया गया है।
चांदनी चौक की गलियों में ‘दिल्ली का असली स्वाद’ चखने का साहस किया। एक दुकानदार ने दावा किया ‘यहाँ के समोसे नेहरू जी को भी पसंद थे!Ó पहली बाइट खाते ही पेट ने विद्रोह कर दिया। शायद नेहरू जी के पास अच्छे डॉक्टर थे। अगले दिन मैंने होटल के रूम में ‘ओआरएस’ के साथ समय बिताया। सच कहूँ तो, इस तरह दिल्ली ने मेरे शरीर को ‘डिटॉक्स’ कर दिया। वैचारिक भोजन की जुगाली करता रहा। पर्स खाली हो रहा था तो, आ अब लौट चलें, वाले अंदाज के साथ वापसी की ट्रेन पकड़ी। ट्रेन चली तो पीछे से किसी की अनुगूंज आई ‘दिल्ली दूर है!’
मुहावरे वाली दिल्ली शाब्दिक रूप से कितनी भी दूर हो, आम जनता के लिए मानसिक रूप से तो वह और भी दूर ही है। यहाँ के ऑटोवाले, भीड़ भाड़ और ‘हिस्टोरिकल ट्रैफिक जाम’, संसद और सचिवालय में घूमते सफेद बगुले, तोंद पर हाथ फेरते काले कौओं से भरे कनॉट प्लेस, पालिका बाजार, मंडी हाउस दिल्ली के वे टूरिस्ट अट्रैक्शन हैं जिन्हें बुद्धि की आंखों से देखना समझना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय हो या एम्स, यहां की भीड़ सिखाती है कि दिल्ली से असली दूरी किलोमीटर में नहीं, बल्कि सहनशक्ति में, पर्स की ताकत से होती है। लोग दिल्ली पहुंचते हैं ट्रेन, हवाई जहाज या बस के टिकिट से और जनप्रतिनिधि दिल्ली पहुंचते हैं चुनावी टिकिट से। फिर वे लोगों से दूर हों न हों पर एक बात तय है—जब तक दिल्ली है, ‘दिल्ली दूर है’ वाली कहावत जिंदा रहेगी।

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